उत्तरकाशी। उत्तराखंड राज्य गठन के बाद पहाड़ के गांवों और मौसम के व्यवहार में बदलाव आए हैं। पलायन बढ़ने से राज्य गठन की अवधारणा को चोट पहुंची है। पलायन और जंगली जानवरों के आतंक से खेती बंजर पड़ रही है। बालिका शिक्षा में बढ़ोत्तरी जरूर हुई है, लेकिन महिलाएं आज भी बोझ तले दबी हुई हैं। यह मानना है अस्कोट-आराकोट अभियान दल के सदस्यों का।
पत्रकार वार्ता में दल के प्रमुख डा. शेखर पाठक ने बताया कि अभियान 25 मई को नेपाल से लगे पांगू गांव से शुरू हुआ है, जो 8 जुलाई को हिमाचल प्रदेश से लगे आराकोट में संपन्न होगा। अभियान दल के सदस्य अब तक पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी के विभिन्न गांवों का भ्रमण कर चुके हैं। डा. पाठक कहना था कि उत्तराखंड में अंतर क्षेत्रीय पलायन के कारण 12 प्रतिशत भूभाग वाले निचले कस्बों और मैदानी शहरों में 56 प्रतिशत आबादी आकर रहने लगी है, जिससे खाली होते गांवों में कृषि भूमि बंजर पड़ रही है। नदियों पर हर साल जल विद्युत परियोजनाआें की संख्या बढ़ती जा रही है। वर्ष 2014 से इसमें सबसे ज्यादा इजाफा हुआ। अभियान दल में शामिल डा. कमल जोशी, प्रकाश उपाध्याय, उपेंद्र सिंह, शंकर सिंह भाटिया, देवेश, रमेश, दीपा, सौरभ, गौरव, राखी, उमा भट्ट आदि शामिल हैं। इस मौके पर प्रसिद्ध पर्वतारोही चंद्रप्रभा ऐतवाल, द्वारिका प्रसाद सेमवाल, संदीप उनियाल, प्रमोद पैन्यूली आदि मौजूद रहे।