उत्तरकाशी। भरपूर कच्चा माल, लेकिन प्रोसेसिंग के लिए पंजाब, हरियाणा पर निर्भरता। इसी के चलते उत्तरकाशी का ऊनी वस्त्र उद्योग कभी प्रतिस्पर्द्धा में टिक नहीं सका। जबकि तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के रूप में यहां आने वाले यात्रियों के बाजार में यहां के बने ऊनी कपड़ों की खासी डिमांड है। इसे भांपकर स्थानीय उद्यमी आमोद राणा ने व्यक्तिगत प्रयास से गंगोरी में ऊन आधारित उद्योग खड़ा किया। साथ ही उन्होंने क्षेत्र के काश्तकारों को बाजार उपलब्ध करा दिया।
1995 में खादी बोर्ड से रजिस्ट्रेशन कराकर अपने घर पर ही एनएमसी चर्खे और पिटलूम से कुटीर उद्योग शुरू करने वाले आमोद राणा ने इस साल बैंक से ऋण लेकर अपना उद्योग खड़ा किया। इसमें ऊनी पंखी, शॉल, स्वेटर, कोट और गर्म कपड़े के साथ ही बच्चों के कपड़े तैयार हो रहे हैं। वे यहां कालीन और ऊनी कंबल बनाने की तैयारी भी कर रहे हैं। 38 लाख रुपये लागत से खड़े किए गए इस प्लांट में ऊन की धुलाई, कार्डिंग, कौमिंग, पूनी और धागा तैयार करने के साथ ही रंगाई व विभिन्न ऊनी उत्पाद तैयार करने की मशीनें लगी हैं।
इस उद्योग में सालाना 500 क्विंटल ऊन के उत्पाद तैयार करने की क्षमता है। इसमें 150 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार की संभावना है। फिलहाल मांग के अनुरूप ऊन न मिलने और अनियमित विद्युत आपूर्ति के बावजूद यहां तीस लोगों को काम मिला है। ऊन की पूनी घर ले जाकर इससे ऊनी वस्त्र बनाने वाले कुटीर उद्यमी अलग हैं।
ऊनी वस्त्र उद्योग की अच्छी संभावनाएं हैं। सरकार यदि कच्चे माल और बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के साथ ही सरकारी विभागों में होने वाली खरीद में प्राथमिकता दे तो इस उद्योग को बढ़ावा मिल सकता है। - आमोद राणा, संचालक गंगोरी ऊनी वस्त्र उद्योग उत्तरकाशी।
ऊनी वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने की जरूरत
उत्तरकाशी। ऊन उत्पादन में अग्रणी होने के बावजूद जिले में प्रोसेसिंग की व्यवस्था न होने से बुनकरों को कताई के लिए तैयार कच्चा माल तक नहीं मिल पाता। मोरी क्षेत्र के लिए 3.39 करोड़ लागत के कार्डिंग प्लांट की योजना पांच वर्षों से ठंडे बस्ते में है। खादी बोर्ड ने अभी हाल ही में डुंडा से 245 क्विंटल ऊन खरीद कर हाथों हाथ मध्य प्रदेश खादी बोर्ड को बेच दी। यहां से बिना धुलाई, कार्डिंग किए इस ऊन को सीधे पंजाब ले जाया जा रहा है। हर साल चलने वाली यह प्रक्रिया स्थानीय ऊन उद्योग को हतोत्साहित करने वाली मानी जा रही है। जानकारों का मानना है कि यदि यहीं पर ढांचागत सुविधाएं जुटाकर ऊनी वस्त्र उद्योग को बढ़ावा दिया जाए तो न सिर्फ भेड़पालकों को ज्यादा मुनाफा होगा बल्कि बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल सकेगा।
इस बार जिला प्लान के बजट से बोर्ड ने डुंडा से 245 क्विंटल ऊन खरीदी। यह ऊन मध्यप्रदेश खादी बोर्ड को बेची गई। बोर्ड के पास अब भी 700-800 क्विंटल ऊन का स्टाक है। भविष्य में स्थानीय उद्यमियों की जरूरत का ध्यान रखकर उन्हें डुंडा केंद्र से ऊन खरीदने का मौका दिया जाएगा। - सुरेंद्र सिंह बौनाल, क्षेत्रीय अधीक्षक, ऊन खादी बोर्ड।