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सिर्फ कागजों में ही बिजली से रोशन हुए हैं हरकीदून घाटी के दूरस्थ गांव

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उत्तरकाशी। हरकीदून घाटी के तीन गांवों का पनबिजली से जगमगाने का सपना दस साल बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। गोविंद वन्य जीव विहार की सीमा के भीतर जन सहभागिता से बनने वाली उरेडा की 100 किलोवाट की चिलूड़गाड़ लघु जल विद्युत परियोजना पर निर्धारित बजट से ज्यादा खर्च के बावजूद उत्पादन शुरू नहीं हो पाया है। ढाटमीर गांव की 40 किलोवाट की खापूगाड और तालुका में 20 किलोवाट की बिजली परियोजनाओं में भी उत्पादन ठप है।
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मोरी के ओसला, पवांणी और गंगाड़ गांव के लिए वर्ष 2008 में 1.69 करोड़ रुपये की लागत से 100 किलोवाट की चिलूड़गाड़ लघु जल विद्युत परियोजना का निर्माण हुआ था। अब तक परियोजना पर दो करोड़ से ज्यादा खर्च हो गया, लेकिन अभी तक सिविल कार्य और ओसला गांव में ट्रांसफार्मर लगाने का काम भी पूरा नहीं हो पाया है। यही स्थिति दो सौ परिवार वाले ढाटमीर गांव की भी है। राजपाल सिंह रावत का कहना है कि क्षेत्र में ढाटमीर, ओसला, पवांणी, गंगाड़ गांव में उरेडा ने कुछ सौर ऊर्जा वाली स्ट्रीट लाइट और 10-10 परिवारों को सोलर पावर पैक देकर कई साल पहले ही विद्युतीकृत दिखा दिया है।
कोट..
ओसला गांव में ट्रांसफार्मर पहुंचाया जा रहा है। समिति के सहयोग से खापूगाड़ परियोजना के सिविल एवं बिजली की लाइन बिछाने के काम पूरे हो चुके हैं। भविष्य में यहां ग्रिड की लाइन आने की संभावना देखते हुए विद्युत गृह में कंट्रोल पैनल आदि अतिरिक्त कार्य से परियोजना की लागत बढ़ सकती है। जल्द ही परियोजना को तैयार कर ओसला, पवांणी और गंगाड़ गांव तक बिजली पहुंचाई जाएगी।
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एलडी शर्मा, उप परियोजना अधिकारी उरेडा मुख्यालय।
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