गोमुख (उत्तरकाशी)। गोमुख क्षेत्र में हुई अतिवृष्टि के बाद जमा हुए मलबे से क्षेत्र की जल विद्युत परियोजनाओं को खतरा उत्पन्न हो गया है। वहीं, नमामि गंगे के तहत बन रही 64 करोड़ की योजनाओं को भी नए सिरे से डिजाइन करने की जरूरत पैदा हो गई है। इस वर्ष जुलाई-अगस्त में भागीरथी के उद्गम क्षेत्र में अतिवृष्टि से भारी तबाही हुई थी। इससे कई टन मलबा नदी किनारे बसे क्षेत्रों में जमा हो गया है। ऐसे में अगली बरसात के आते ही मनेरी भाली तथा टिहरी बांध पर असर पड़ना स्वाभाविक है। इस मलबे से तटवर्ती क्षेत्रों में बसे लोगों के लिए भी बड़ा खतरा पैदा हो गया है।
गोमुख से गंगोत्री तक के 18 किमी लंबे प्रवाह पथ में देवगाड़, चीड़वासा सहित 7 बड़े गदेरों के मलबे ने नदी का रुख बदल दिया है। तपोवन और नीला ताल में बने गदेरों का मलबा भी डाउन स्ट्रीम में जमा होता जा रहा है। ऐसे में भागीरथी में जमा मलबा बरसात में गंगोत्री, उत्तरकाशी सहित टिहरी झील तक पहुंचेगा। इससे क्षेत्र के दो बड़े बांधों में गाद जमा होने से इन परियोजनाओं का गेट, ढांचा और जलमग्न कलपुर्जों को नुकसान पहुंचने की आशंका है।
मनेरी भाली परियोजना के डीजीएम संजय जोशी कहते हैं कि मनेरी भाली स्टेज प्रथम को भारी गाद आने के कारण जुलाई अगस्त में 40 दिन तक बंद करना पड़ा था। द्वितीय चरण की परियोजना में भी कई बार विद्युत उत्पादन रोक कर फ्लशिंग करनी पड़ी।
कोट...
उत्तरकाशी मौसम को लेकर संवेदनशील क्षेत्र बनता जा रहा है। 2013 तथा इस वर्ष की अतिवृष्टि आने वाले खतरे का उदाहरण मात्र है। दरअसल, अभी तक पैरा ग्लेशियर जोन की धारक क्षमता को लेकर कोई स्टडी नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में भागीरथी घाटी में बन चुकी और बनने जा रही विद्युत परियोजनाओं के जीवनकाल की कोई गारंटी नहीं दे सकता है। - डा.नवीन जुयाल, वैज्ञानिक भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाल अहमदाबाद।