टिहरी रियासत से शुरू हुई गोरशाली गांव की रामलीला ने 112 स्वर्णिम वर्षों का सफर पूरा किया है। यहां की रामलीला की खास बात यह है कि राजा के प्रतिबंध के चलते यहां राजतिलक भगवान राम के पात्र का नहीं, बल्कि गांव के ईष्ट बासुकी नाग देवता का किया जाता है।
भटवाड़ी के गोरशाली गांव में रामलीला की शुरूआत 1904 में हुई थी। तत्कालीन टिहरी रियासत के गुप्तचरों ने राजा तक इसकी सूचना दी।
बताया जाता है कि गुप्तचरों ने राजा को बताया कि गोरशाली गांव में रामलीला का आयोजन किया जा रहा है। इसमें टिहरी रियासत के राजा के बजाय भगवान राम के पात्र का राजतिलक किया जाता है।
इसके बाद राजा ने गांव की रामलीला पर प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी कर दिया। कुछ समय बाद गांव के दो बुजुर्गों अवि सिंह तथा मातबर सिंह चौहान ने कारोबारी राधा बल्लभ तथा घनानंद खंडूड़ी के माध्यम से टिहरी रियासत के राजा तक पैरवी की और क्षमा याचना के बाद रामलीला पर लगे प्रतिबंध को हटवाया।
राजा ने ताम्र पत्र देकर रामलीला को मान्यता दी और ग्रामीणों को राजतिलक गांव के ईष्ट बासुकी नाग देवता का करने की बात कही। तब से यह परंपरा जीवित है।
दोपहर के समय होने वाली रामलीला में मंचन के साथ-साथ 21 दिनों तक राम कथा, हनुमान चालीसा, कर्मकांड, अनुष्ठान आदि होता है। रामलीला की शुरूआत मंगसीर की दीपावली के दूसरे दिन ध्वजा फहराकर होती है।
रोजाना सुबह प्रभात फेरी में मंगला चरण के बाद दोपहर में व्यास पीठ से राम कथा का प्रवचन के बाद रामलीला का मंचन किया जाता है। 298 परिवार वाला यह गांव इस अनुष्ठान में शामिल होता है।
व्यास पीठ से राम कथा का प्रवचन कर रहे चार धाम विकास परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष सूरत राम नौटियाल ने बताया कि यहां 21 दिनों तक समिति के लोग व पात्र वर्णित रह कर एक समय भोजन कर यहीं मंदिर में रहते हैं। गांव के आलम सिंह चौहान की ओर से चलाई गई मुहिम को लोगों ने आज भी जीवित रखे हुए है।
अच्छे मंचन पर मिली 100 स्वर्ण मुद्राएं
गांव के बुजुुर्ग मदन सिंह राणा, अब्बल सिंह बताते हैं कि रियासत काल में शिकारी व लकड़ी के कारोबारी अंग्रेज फेडरिक विल्सन ने गोरशाली की रामलीला की तारीफ सुनी और उन्होंने 1914 मे हर्षिल में ग्रामीणों से रामलीला का मंचन करवाया और प्रसन्न होकर समिति को 100 स्वर्ण मुद्राएं इनाम में दी।