सिडकुल की टाटा मोटर्स कंपनी में सोमवार को हुआ बवाल अचानक ही होने वाली घटना नहीं थी। शनिवार को ट्रेनी ऑपरेटर की मौत को लेकर सहकर्मियों में दो दिनों से आक्रोश की चिंगारी पनप रही थी, जो सोमवार को फूट पड़ी। नतीजतन प्लांट में उत्पादन तो बाधित हुआ, साथ ही पथराव और तोड़फोड़ को अंजाम दिया गया। यदि प्रबंधन आक्रोश को पहले ही संजीदगी से ले लेता तो स्थितियां गंभीर रूप धारण नहीं करतीं।
बता दें कि शनिवार को कंपनी में ट्रेनी ऑपरेटर संदीप कुमार विश्वकर्मा की हृदय गति रुकने से मौत हो गई थी। रविवार को पोस्टमार्टम हाउस में सहकर्मियों ने प्रबंधन पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा काटा था। आरोप था कि संदीप के इलाज में लापरवाही बरती गई। एंबुलेंस देरी से आई और उसमें भी सिर्फ चालक ही था। इसके अलावा परिजनों को न तो उचित मदद दी गई और न ही शव ले जाने के लिए वाहन का इंतजाम किया गया। प्रबंधन ने श्रमिकों के आक्रोश को हल्के में लिया और मृतक के परिजनों से वार्ता कर मामला खत्म होने की बात कही। लेकिन, प्रबंधन के रुख से श्रमिकों के भीतर भड़क रही चिंगारी ने सोमवार को उग्र रूप ले लिया।
पहली शिफ्ट में आए नीम प्रोजेक्ट, ट्रेनी, अप्रेंटिस और अस्थाई श्रमिकों ने काम बंद कर दिया। उन्होंने मृतक के परिजनों को 25 लाख मुआवजा, पेंशन और एक सदस्य को नौकरी की मांग की। प्रबंधन ने नौकरी और पेंशन की बात तो मानी, लेकिन मुआवजा देने से हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद जब दूसरी शिफ्ट में श्रमिक आए तो 25 लाख मुआवजा घोषित नहीं होने की बात ने तूल पकड़ लिया। पुलिस ने आक्रोशित श्रमिकों को शांत करने की कोशिश की तो श्रमिकों ने पथराव कर दिया। कम संख्या बल होने की वजह से पुलिस को पीछे हटना पड़ा।
पुलिस सुरक्षा में निकली बसें
रुद्रपुर। टाटा कंपनी में बिगड़े हालात के बाद बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स पहुंच गई थी। इसके बाद स्थायी कर्मचारियों की बसों को पुलिस की सुरक्षा के बीच गेट से बाहर निकाला गया। आंदोलन में शामिल कुछ श्रमिकों ने बताया कि बवाल होने के चलते फैक्ट्री का काम बाधित हुआ।