पंतनगर। खरपतवार विज्ञान निदेशालय जबलपुर की ओर से जीबी पंत कृषि विवि के शस्य विज्ञान विभाग में खरपतवार नियंत्रण परियोजना संचालित की जा रही है। आईसीएआर से वित्तपोषित इस परियोजना के तहत गाजर घास उन्मूलन के लिए बुधवार को एलपीएम में जागरूकता सप्ताह शुरू किया गया।
कुलपति डाॅ. एमएस चौहान ने बताया कि इसके परागकण नाक से शरीर में प्रवेश कर जाते है। इससे मनुष्य में अनुवांशिक अस्थिरता उत्पन्न होकर टेस्टोस्टोरोन का स्तर बढ़ा देता है। इससे मनुष्यों में जल्दी परिपक्वता आ जाती है। निदेशक शोध डाॅ. एएस नैन ने बताया कि भारत में इस घास का आगमन वर्ष 1955 में हुआ। देश के करीब 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में यह गाजर घास फैली है। इसके संपर्क में आने से खाज-खुजली, चमड़ी सख्त होकर फट जाती है। घाव भी बन जाते हैं।
अधिष्ठाता कृषि डाॅ. एसके कश्यप ने बताया कि बीज बनने से पहले ही इसे नष्ट कर दें। शस्य विज्ञान विभागाध्यक्ष डाॅ. एमएस पाल ने बताया कि गाजर घास को कांग्रेस घास, चटक चांदनी, गंधी बूटी आदि नामों से भी पहचाना जाता है। इसके प्रभाव से मनुष्यों में डरमेटाइटिस, एलर्जी, चर्मरोग, फीवर, अस्थमा जैसी बीमारियां और पशुओं के खाने से दूध में कमी, विषाक्तता हो जाती है। परियोजनाधिकारी डाॅ. एसपी सिंह ने बताया कि अब खेती वाले क्षेत्रों में भी गाजर घास पहुंच गई है। इससे फसलों को 40 प्रतिशत तक की हानि हो रही है। वहां डीन पीजीएस डाॅ. केपीएस रावेरकर, डीएसडब्ल्यू डाॅ. ब्रजेश सिंह आदि थे।
बचाव के लिए किया मैक्सिकन बीटल कीटों का फैलाव
पंतनगर। कुलपति डाॅ. एमएस चौहान ने बताया कि गाजर घास के जैविक नियंत्रण के लिए मैक्सिकन बीटल को उपयोग में लाया जाता है। उन्होंने मैक्सिकन बीटल की वृद्धि और संरक्षण के लिए इनके अंडों को संरक्षित रखकर समय पर उपयोग करने पर जोर दिया। अंत में सभी अतिथियों ने गाजर घास के नियंत्रण के लिए मैक्सिकन बीटल कीटों का फैलाव किया।