जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विवि पंतनगर के कृषि वानिकी अनुसंधान केंद्र में सफेद और लाल चंदन के पौधे तैयार कर किसानों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। बीते दिनों किसान मेले में लगाए गए केंद्र के स्टाॅल पर चंदन की खेती के लिए लोगों को जागरूक किया गया।
केंद्र के प्रक्षेत्र सहायक पवन दुबे ने बताया कि चंदन के पेड़ रेतीले और बर्फीले क्षेत्रों में नहीं उगाए जा सकते। सफेद चंदन की लकड़ी भारी, पीली और महीन दाने वाली होती है। यह दशकों तक अपनी खुशबू बरकरार रखती है। इसकी लकड़ी दुनिया की सबसे महंगी लकड़ियों में शुमार है। सफेद चंदन की खेती के लिए 6.5 पीएच स्तर से अधिक वाली मिट्टी की आवश्यकता होती है। इस कारण यह उत्तर भारत के कुछ भागों में की जाती है। लाल चंदन के लिए 4.5 से 6.0 पीएच स्तर वाली मिट्टी की जरूरत होती है। इसकी खेती मुख्यतः दक्षिणी भारत में अधिक होती है। बताया कि चंदन की खेती में एक पेड़ से लगभग 2.5 लाख रुपये तक मिल सकते हैं। संवाद
परजीवी पौधा है चंदन, अकेले जीवित नहीं रहता
सफेद चंदन की विशेषता
सफेद चंदन का प्रयोग अधिकतर परफ्यूम में किया जाता है। आयुर्वेद में भी सफेद चंदन का व्यापक रूप से प्रयोग होता है। इसे सौंदर्य और त्वचा की देखभाल के लिए तरल और पाउडर के रूप में तैयार किया जाता है। इसका इस्तेमाल खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों में भी किया जाता है। सफेद चंदन की लकड़ी को उसके घने चरित्र के कारण नक्काशी में महत्व दिया जाता है। प्राचीनकाल से ही चंदन का तेल इत्र बनाने में एक प्रमुख घटक रहा है। सफेद चंदन के पेड़ को आठ साल तक किसी बाहरी सुरक्षा की जरूरत नहीं होती क्योंकि तब तक उसमें कोई खुशबू नहीं होती। जैसे ही लकड़ी के पकने की प्रक्रिया शुरू होती है, उसमें से खुशबू आने लगती है।
लाल चंदन की खूबी