वर्तमान में देश का एक बड़ा तबका युवा है, परंतु इन युवकों का दुर्भाग्य कहें या देश की बदलती परिस्थितियों को दोषी मानें कि जिस प्रकार देश में पश्चिमी-सभ्यता का जो बोलबाला है, उससे युवाओं को सही दिशा नहीं मिल पा रही है। युवा मन और युवा शक्ति चाहे तो देश की बिगड़ी हुई तस्वीर-तकदीर बदल सकती है, लेकिन ऐसा कम हो रहा है। एक तरफ जहां आज की युवा पीढ़ी पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित होकर 14 फरवरी को वेलेंटाइन डे के रूप में बना रही है। वहीं समाज में कई ऐसे लोग हैं, जो अपना बिना प्रचार-प्रसार किए इंसानियत के नाते समाज सेवा में लगे हैं। वे समाजसेवा को ही वेलेंनटाइन डे मानते हैं।
फ्री कर रहे इलाज
डॉ. ज्ञान प्रकाश भारद्वाज आवास विकास में होम्योपेथिक अस्पताल चला रहे हैं। वे 2003 से असहाय, बेघर और इलाज का पैसा न चुका पाने वालों का फ्री इलाज कर रहे हैं। साथ ही समाज में गंदी नजरों से देखे जाने कुष्ट रोगियों का इलाज भी कर रहे हैं। वे हर सप्ताह कुष्ठ आश्रम जाकर कुष्ठ रोगियों के साथ समय बीताने के साथ उनका फ्री चेकअप के साथ मुफ्त दवा भी देते हैं। डॉ. ज्ञान प्रकाश ने बताया कि वह हर सप्ताह बीपीएल कार्ड और इलाज का खर्च न उठाने वालों के लिए फ्री चिकित्सा शिविर लगाने वाले हैं। जिसमें जांच के अलावा दवा मुफ्त दी जाऐगी।
बिछड़े बच्चों को मिलाना जीवन का लक्ष्य
डॉ. रजनीश बत्रा सनातन धर्म इंटर कालेज में शिक्षिका हैं। कैलाश सत्यार्थी के विचार सुनने के बाद उनके जीवन में ऐसा बदलाव आया कि उन्होंने शिक्षा के साथ मां-बाप से बिछड़े बच्चों को मिलाना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने 2009 से इस फील्ड में काम करते हुए कई बच्चों को उनके मां-बाप से मिलवाया। वे अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि 15 अप्रैल 2014 को झारखंड की लड़की मेबल चरपिया अपने परिजनों से बिछड़ के रुद्रपुर आ गई थी। उसको मिलाने के बाद उसे अब तक की सबसे बड़ी खुशी प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि वेलेंटाइन डे मनाने में वो खुशी नहीं मिल सकती जो बिछड़े बच्चों को उनके मां-बाप से मिलाने में मिलती है।