हरिपुरा जलाशय के पार जंगल किनारे बसे सात गांव के लोग लंबे समय से मात्र एक नाव के सहारे जान जोखिम में डालकर आवागमन कर रहे हैं। डैम पार के लोग इस समस्या के एक स्थायी समाधान के लिए पुल बनवाने की मांग उठा रहे हैं।
नया राज्य बने 16 साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन हरिपुरा जलाशय पार बसे सात गांवों के ग्रामीण अब भी विकास से कोसों दूर हैं। यहां बसे ग्रामीणों के लिए घर से बाहर आने का एक मात्र साधन नाव ही है। ग्रामीणों के अनुसार नाव का सफर जोखिम भरा रहता है। नाव के अंदर रिसाव से पानी आता रहता है, वहीं तेज हवा के दौरान नाव का संतुलन बनाना भी किसी खतरे से कम नहीं।
ग्रामीण चतुर सिंह ने बताया कि डैम में पानी भरा होने के कारण रात में किसी ग्रामीण को कोई तकलीफ होने की दशा में अंदर से बाहर आने को कोई साधन ही नहीं है। बताया कि नाव शाम के बाद दूसरे घाट पर खड़ी कर दी जाती है। खड़क सिंह ने बताया कि नाव को सुबह गांव के घाट तक पहुंचने में देरी होने कारण बाहर पढ़ने वाले बच्चे समय से स्कूल नहीं पहुंच पाते हैं। उधर, ग्रामीण भी बाहर से गांव तक पहुंचने को नाव के इंतजार में घंटों धूप में तपते रहते हैं।
अब लोगों का कहना है कि उनके आने-जाने को एक अदद पुल की जरूरत को पूरा किया जाना चाहिए। कठपुलिया निवासी जसविंदर सिंह ने बताया कि लगभग एक वर्ष पूर्व बौर और हरिपुरा जलाशय के मध्य बने कट पर पुल की नापजोख की गई थी।
तब से अब तक वह कार्रवाई भी ठंडे बस्ते में चली गई। उधर कोपा मुनस्यारी के ग्रामीणों का कहना है कि कट पर पुल बनने का उनको तभी लाभ होगा जब उनके गांवों से कट तक पहुंचनेे को चार नालों पर पुल और सीसी सड़क बने।
पुल बनाने को सरकार गंभीर: प्रेम सिंह
क्षेत्र के दर्जा राज्य मंत्री पिछड़ा वर्ग कल्याण परिषद के अध्यक्ष प्रेम सिंह ने बताया कि जलाशय पार बसे ग्रामीणों की आवागमन की यह समस्या वाकई गंभीर है। इसके लिए वर्ष 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने दोनों जलाशयों के मध्य एक झूला पुल बनाने को हरी झंडी दे दी थी।
एक पहले पूर्व राजस्व, लोनिवि और वन विभाग की संयुक्त टीम ने सर्वे भी कर लिया था। प्रयोक्ता एजेंसी ने प्रस्ताव बनाकर देहरादून स्थित भूमि हस्तांतरण विभाग को भेज दिया था। इसके बाद राजनैतिक उठापटक में मामला लटक गया है। जल्द ही इसके लिए सीएम से मिला जाएगा।