जल संस्थान की चार दशक के भी अधिक पुरानी पाइप लाइनें जर्जर हो चुकी हैं। जिसके चलते लाइनों में लीकेज होना आम बात है। लीकेज जनता के साथ ही विभाग के लिए भी सिरदर्द बना हुआ है।
जनता जहां पानी के लिए परेशान रहती है, वहीं लीकेज ठीक करने के लिए कोई अलग से बजट न होने की वजह से अधिकारियों को उधारी में जैसे तैसे काम चलाना पड़ता है। बेहद बुरे हालात में पहुंच चुकी लाइनों को बदला जाना बेहद जरूरी है, लेकिन अभी तक यह काम फाइलों से धरातल पर नहीं उतर सका है।
दरअसल शहर में पेयजल लाइनें सत्तर के दशक में बिछाई गई थीं। तब आबादी का दबाव कम था। धीरे-धीरे आबादी बढ़ने के साथ ही लोगों की पानी की जरूरतों में भी इजाफा हुआ लेकिन पाइप लाइनों की स्थिति आज भी वैसी ही है। लाइन पुरानी होने के कारण जगह-जगह से लीकेज हो रही है।
वर्तमान में नागनाथ मंदिर के पीछे, तूफैल के बाग में, मोहल्ला महेशपुरा में कब्रिस्तान के सामने, गौतम नगर में कलश मंडप के सामने, महेशपुरा पानी के टैंक के सामने, आर्यनगर, कटोराताल नई बस्ती में, विजय नगर, सीतापुर आई अस्पताल के सामने और कटरा मालियान में करीब 10 जगहों पर लाइन लीक हो रही हैं।
कुछ जगहों पर पहले भी संस्थान लीकेज ठीक करा चुका है। लेकिन अभी भी कई जगह बराबर लीकेज हो रही है। हर महीने लीकेज ठीक करने में करीब 10-12 हजार रुपये खर्च होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लाइनों का यही हाल है। लीकेज से जहां रोजाना सैकड़ों लीटर पानी बर्बाद हो जाता है, वहीं पानी घरों तक नहीं पहुंच पाता है।
उधारी में सामान खरीद ठीक कराते हैं लीकेज
जल संस्थान के शिकायत रजिस्टर में लीकेज, गंदा पानी, पानी नहीं आने की दर्जनों शिकायतें रोजाना दर्ज होती हैं। लीकेज ठीक करने को लेकर अधिकारी लापरवाह रहते हैं। जिसकी वजह अलग से बजट नहीं मिलना भी है। सहायक अभियंता शिशुपाल यादव कहते हैं कि अलग बजट नहीं मिलने के कारण लीकेज ठीक करने के लिए उधारी में सामान खरीदा जाता है। जिसके बिल भुगतान के लिए मुख्यालय भेजे जाते हैं। बिलों का भुगतान होने में काफी लंबा समय लग जाता है। जैसे तैसे काम चलाया जा रहा है।