पंतनगर। खेतों में मक्के की फसल काटते ही आमताैर पर रेशों को अब तक बेकार समझकर फेंक दिया जाता है। अब यही रेशे किसानों की आमदनी बढ़ाने की नई कुंजी बन सकते हैं। जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नए शोध ने इनकी उपयोगिता साबित की है। ये मक्के के रेशे (कॉर्न सिल्क) स्वास्थ्य, सौंदर्य और स्वरोजगार के लिए कुंजी साबित हो सकते हैं।
पंत विश्वविद्यालय के खाद्य विज्ञान और पोषण विभाग की वैज्ञानिक डाॅ. रीता सिंह रघुवंशी और एसआरएफ अपूर्वा ने यह महत्वपूर्ण शोध किया है। इसमें सामने आया कि मक्के के रेशों से बना पाउडर सूप, दलिया, शोरबा, पेय पदार्थ और बेकरी उत्पादों की पौष्टिकता बढ़ाने में मददगार है। कॉस्मेटिक क्षेत्र में इनसे बने उत्पाद त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाने में सहायक हैं।
मक्के के रेशों में मौजूद फ्लेवोनॉयड, फेनोलिक यौगिक, फाइटोस्टेरॉल, प्राकृतिक फाइबर और जरूरी खनिज शरीर के लिए बेहद लाभकारी हैं। ये तत्व सूजन कम करने, एंटीऑक्सीडेंट सुरक्षा देने और मेटाबाॅलिज्म संतुलन सुधारने में सहायक होते हैं। यही कारण है कि चीन, अमेरिका, कोरिया, तुर्की और भारत जैसे देशों में पारंपरिक व आधुनिक उपचार पद्धतियों में इनका उपयोग किया जा रहा है।
खास बात यह है कि इसके लिए न तो अतिरिक्त भूमि चाहिए और न ही नई फसल उगाने की जरूरत। वैज्ञानिकों का मानना है कि कॉर्न सिल्क आधारित लघु उद्योगों को अपनाकर युवा स्थानीय स्तर पर रोजगार पा सकते हैं और इससे राज्य में पलायन पर भी प्रभावी रोक लग सकती है।
कम वसा, भरपूर पोषण
शोध के नतीजे बताते हैं कि मक्के के रेशे पोषण का संतुलित भंडार हैं। इनमें 12 से 17 प्रतिशत तक प्रोटीन पाया जाता है। इसमें वसा की मात्रा महज 0.5 से 1.2 प्रतिशत होती है। इसके बावजूद इनमें मौजूद फाइटोस्टेरॉल और टोकोफेरॉल शरीर में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट को बढ़ाते हैं। 27 से 56 प्रतिशत तक कार्बोहाइड्रेट और उच्च मात्रा में फाइबर पाचन तंत्र और आंतों की सेहत को मजबूत बनाते हैं।
कई बीमारियों में असरदार
वैज्ञानिकों के अनुसार, मक्के के रेशे मूत्र उत्सर्जन को बढ़ाकर गुर्दों पर दबाव कम करते हैं और शरीर से हानिकारक अपशिष्ट बाहर निकालने में मदद करते हैं। पारंपरिक चिकित्सा में इन्हें मूत्र संक्रमण, पेशाब में जलन और अवरोध जैसी समस्याओं में उपयोग किया जाता रहा है। इनमें मौजूद पोटैशियम रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक है, जबकि फाइटोस्टेरॉल कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड के स्तर को संतुलित रखते हैं।
दुनियाभर में हर साल करीब 15 मिलियन टन कॉर्न सिल्क बिना उपयोग के नष्ट हो जाता है। यही रेशे फंक्शनल फूड, स्वास्थ्य पेय, प्राकृतिक संरक्षक, कॉस्मेटिक और औद्योगिक उत्पादों के रूप में किसानों की आय बढ़ा सकते हैं।
-डाॅ. रीता सिंह रघुवंशी, वैज्ञानिक, खाद्य विज्ञान एवं पोषण विभाग, जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विवि