पुलिस हिरासत में मौत पर पहली बार खाकी दागदार नहीं हुई है। जिले के थाना, चौकियों में पहले भी इस तरह की घटनाओं में कई पुलिस कर्मी फंस चुके हैं। लेकिन फिर भी ऐसी घटनाओं से पुलिस ने सबक नहीं लिया। इसके चलते खाकी पर एक और दाग लग गया। सवाल खड़ा हो रहा है कि लड़की भागने के मामले में पुलिस ने किशोर को तीन दिन तक हिरासत में क्यों रखा। घटना के बाद से पुलिस कर्मियों में हड़कंप मचा हुआ है।
करीब डेढ़ दशक पहले यूपी के जमाने में काशीपुर में पुलिस कस्टडी में एक ऊन कारोबारी काले की मौत के बाद शहर मेें जमकर बवाल हुआ था। मामले में पुलिस कर्मी के सस्पेंड होने के साथ ही मुकदमा दर्ज भी हुआ था। वर्ष 2006 में रुद्रपुर के रम्पुरा में रहने वाले बुजुर्ग चूड़ामल को पुलिस पूछताछ के लिए रम्पुरा चौकी लाई थी और उसकी मौत हो गई थी। नाराज लोगों ने जमकर हंगामा काटते हुए एनएच पर जाम लगाकर कोतवाली में पथराव किया था। पुलिस को बेकाबू लोगों पर लाठीचार्ज करना पड़ा था। मामले में भी तत्कालीन चौकी इंचार्ज और पुलिस कर्मी सस्पेंड होने के साथ ही उन पर मुकदमा दर्ज हुआ था।
पुलिस ने 35 नामजद सहित अज्ञात पर मुकदमा दर्ज किया था। वर्ष 2008 में गदरपुर थाने में एक आरोपी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। तत्कालीन एसओ पीसी भट्ट को लाइन हाजिर किया गया था। वर्ष 2010 में रुद्रपुर कोतवाली में चोरी के मामले में पूछताछ के लिए लाए गए बिंदुखेड़ा निवासी बलविंदर सिंह की मौत हो गई थी। मामले में प्रभारी कोतवाल तत्कालीन प्रशिक्षु आईपीएस को सस्पेंड किया गया था।
20 अप्रैल 2015 को किच्छा थाने के लालपुर चौकी में महिला की हत्या के मामले में पूछताछ के लिए लाए गए जसविंदर सिंह उर्फ जस्सा की मौत हो गई थी। मामले में भी आक्रोशित लोगों ने जमकर बवाल किया था। इसके बाद तत्कालीन सीओ जेआर जोशी, एसएसआई कमाल हसन, एसआई मनोज कुमार और कांस्टेबल सस्पेंड होने के साथ ही मुकदमा दर्ज किया गया था। सीबीसीआईडी ने जांच कर कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की थी। अब काशीपुर के कटोराताल चौकी में किशोर जियाउद्दीन रजा की मौत ने पुलिस को कटघरे में खड़ा कर दिया है। साफ है कि मानवाधिकारों की बात करने वाली पुलिस ने ही उसका उल्लंघन किया। जिस वजह से एक किशोर को जान से हाथ धोना पड़ा।