सितारगंज। सिडकुल की औद्योगिक इकाइयों पर कैलाश नदी में केमिकलयुक्त अपशिष्ट जल छोड़े जाने के आरोप लगा हैं। इसका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि पानी में घुल रहे जहर से पर्यावरण, लोगों की आजीविका और स्वास्थ्य पर गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
ग्रामीणों ने बताया कि सिडकुल की कई बड़ी औद्योगिक इकाइयां सीईटीपी पर निर्भर रहने के बाद भी बिना समुचित जलशोधन के केमिकलयुक्त पानी नदी में छोड़ रही हैं। कुछ कंपनियां भूमिगत पाइपलाइन के माध्यम से दूषित पानी सीधे नदी तक पहुंचा रही हैं। सोमवार को सोशल मीडिया पर भूमिगत पाइपलाइन के जरिए नदी में कथित जहरीला पानी छोड़े जाने का वीडियो वायरल हुआ है। ग्रामीणों का दावा है कि इस प्रदूषित पानी के कारण उकरौली, साधुनगर, लक्ष्मीझाला, कल्याणपुर, सिसौना और बरुआबाग समेत कई गांवों में दर्जनों मवेशियों की जहरीला पानी पीने से मौत हो चुकी है। नदी किनारे रहने वाले लोगों, विशेषकर बच्चों में चर्म रोग होने का मामला सामने आया है। आरोप है कि औद्योगिक अपशिष्ट के शोधन के लिए स्थापित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) स्वयं प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर रहा है। ग्राम पंचायत सदस्य नंदलाल ने उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला प्रशासन से सीईटीपी की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। संवाद
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सीपीसीबी लगातार ओसीईएमएस पोर्टल के माध्यम से सीईटीपी से निकलने वाले उपचारित जल की निगरानी कर रही है। उपचारित पानी के नमूनों की नियमित रूप से मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में जांच भी कराई जाती है। सीईटीपी से पानी का डिस्चार्ज निर्धारित पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप किया जा रहा है। जांच में किसी प्रकार की कमी या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित मानकों और नियमों के तहत आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
- हिमांशु डालाकोटी, प्लांट मैनेजर सीईटीपी
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सभी इकाइयां अपना डिस्चार्ज वाटर सीईटीपी को उपलब्ध कराती हैं, जहां उसका निर्धारित प्रक्रिया के तहत शोधन किया जाता है। इसके बाद उपचारित पानी को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के निर्धारित मानकों के अनुरूप ही नदी में छोड़ा जाता है।
- दुर्गेश मोहन, अध्यक्ष, सितारगंज-सिडकुल इंडस्ट्रीज वेलफेयर एसोसिएशन