कांग्रेस में हुई बगावत और कांग्रेस के बागियों की भाजपा में एंट्री के बाद चुनाव के लिहाज से ऊधमसिंहनगर में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के राजनीतिक समीकरण उलट-पुलट हो गए हैं। दोनों ही दलों ने बड़े नेताओं के लिए भूमिका तय कर ली हो पर इनके समर्थकों की दूसरी पंक्ति के नेताओं को लेकर दोनों ही उलझन में हैं।
कांग्र्रेस यह नहीं तय कर पा रही कि चुनाव के लिहाज से बागियों के समर्थकों को बाहर का रास्ता दिखाए, या उनकी पार्टी के प्रति निष्ठा का आकलन करने के बाद कदम उठाये। भाजपा को भी पार्टी में विरोध की आशंका है, पर विरोध जताने वालों को लेकर वह भी कोई रणनीति तय नहीं कर पाई है।
यह अब करीब-करीब साफ है कि एक ओर जहां बागियों के समर्थक कांग्रेस की राह में रोड़ा बनेंगे, वहीं दूसरी ओर खांटी भाजपाई सिपाहसालार अपनी ही पार्टी की नींव हिलाने की कोशिश कर सकते हैं। विधानसभा चुनाव की दिशा तय करने में बागी खेमे के समर्थकों की भूमिका खासी अहम मानी जा रही है।
वर्तमान में मुख्यमंत्री हरीश रावत सरकार और प्रदेश आलाकमान बागी समर्थकों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई का मन नहीं बना रहा है, लेकिन आशंका है कि बागी समर्थक ऐन वक्त पर कहीं पार्टी का समीकरण न बिगाड़ दें। ऐसे में कांग्रेस पार्टी भी फूंक-फूंक बागी समर्थकों की हर गतिविधि पर नजर रखे हुए है। वहीं कई भाजपा समर्थक बागियों को पार्टी में शामिल किए जाने से खार खाए बैठे हैं। ऐसे में वह भी ऐन विधानसभा चुनाव के दौरान नया गुल खिला सकते हैं।
सूत्रों की मानें तो खटीमा से लेकर जसपुर तक कांग्रेस के बागी विधायकों के समर्थकों की फेहरिस्त खासी लंबी है। उन्हीं के वरदहस्त के कारण उन्हें कई सुविधाओं से भी नवाजा गया, लेकिन अब जब बागियों को पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है, ऐसे में खुद पार्टी हाईकमान पशोपेश की स्थिति में आ गया है।
पार्टी हाईकमान भी जानता है कि अगर बागियों के समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई हुई तो पार्टी के समक्ष मुसीबतों का पहाड़ खड़ा हो सकता है। यही कारण है कि बागी समर्थकों को वह खास तव्वजो भी दे रही है। वहीं दूसरी ओर बागियों को पार्टी में शामिल किए जाने को लेकर विरोध के सुर अभी से फूटने लगे हैं जिसने भाजपा हाईकमान की पेशानी पर बल ला दिए हैं।