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UK: पुदीना की नई खुशबू ने खोला खुशहाली और उम्मीदों का दरवाज, वैज्ञानिकों ने सिम-इंदुधारा प्रजाति विकसित की

Fri, 28 Nov 2025 03:37 PM IST
हीरा मेहरा अमर उजाला नेटवर्क, ऊधम सिंह नगर

सार

केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) के वैज्ञानिकों ने एक खास प्रजाति सिम इंदुधारा विकसित की है। यह किसानों के लिए बढ़ी पैदावार, ज्यादा तेल और कम खर्च का नया रास्ता खोल रही है।
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पुदीना
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विस्तार
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पुदीना उगाने वाले किसानों के खेतों से नई उम्मीदों की महक उठने लगी है। केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान (सीमैप) के वैज्ञानिकों ने एक खास प्रजाति सिम इंदुधारा विकसित की है। यह किसानों के लिए बढ़ी पैदावार, ज्यादा तेल और कम खर्च का नया रास्ता खोल रही है।

पुदीना को कृषि और कारोबार की दुनिया में मेंथा के नाम से जाना जाता है। सीमैप ने पिछले महीने किसानों के लिए सिम इंदुधारा को रिलीज किया है। इस प्रजाति की सबसे खास बात है इसकी मीठी सुगंध, मजबूत बनावट और तेजी से बढ़ने की क्षमता। वैज्ञानिकों के मुताबिक सिम इंदुधारा में सकर्स (जड़ें) तेजी से बनती हैं। इसका पौधा सीधा खड़ा होता है और तेल की मात्रा पुरानी प्रजातियों की तुलना में अधिक मिलती है। यही वजह है कि किसान इससे 22 प्रतिशत तक अधिक उपज हासिल कर सकते हैं। सिंचाई और खाद की जरूरत भी बेहद कम पड़ती है इसलिए अगली फसल में अतिरिक्त खर्च लगभग शून्य हो जाता है।

सीमैप की यह नई प्रजाति एफएमसीजी, दवा और कॉस्मेटिक्स उद्योगों के लिए भी बेहतर गुणवत्ता का कच्चा माल उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। संस्थान ने इसे पिछले महीने किसानों के लिए रिलीज किया है। 

सौ दिन में फसल तैयार होगी

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मेंथा की नई विकसित प्रजाति के पौधे 125–130 सेंटीमीटर तक ऊंचे होते हैं। यह मात्र 100–110 दिन में फसल के रूप में तैयार हो जाते हैं। एक हेक्टेयर में 200–210 किलोग्राम वजन तक तेल निकाला जा सकता है जो सामान्य किस्मों की तुलना में काफी अधिक है। इसके तेल में अन्य प्रजातियों से लगभग 15–20% ज्यादा सुगंध पाई गई है। वैज्ञानिक आइसोमेथॉन, मेथॉन और अन्य रासायनिक गुणों के आधार पर इसकी शुद्धता और गुणवत्ता को बेहतर मान रहे हैं।

रोग-प्रतिरोधी, निर्यात योग्य क्वालिटी
इस प्रजाति में 0.55 से 0.65 प्रतिशत तक तेल मिलता है। साथ ही मेंथॉल कंटेंट 50–55 प्रतिशत तक है। यही कारण है कि इसे निर्यात के लिहाज से भी उत्कृष्ट माना जा रहा है। इसकी पत्तियां गहरे हरे रंग की, तना गाढ़ा बैंगनी और पौधा बेहद मजबूत संरचना वाला है जो इसे रोगों से लड़ने में सक्षम बनाता है।

 

 

आयात पर निर्भरता घटेगी

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सीमैप की ओर से तैयार की गई इस किस्म से निकला तेल खाने-पीने की चीज़ों, टूथपेस्ट, खांसी की दवाओं, सौंदर्य प्रसाधनों और सुगंधित उत्पादों में इस्तेमाल लायक है। फिलहाल भारत को हर वर्ष 130 टन मेंथा ऑयल आयात करना पड़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इंदुधारा के चलते आने वाले वर्षों में आयात पर निर्भरता कम की जा सकेगी। 

 

यह मेंथा की मीठी सुगंध वाली प्रजाति है। इसे मुख्य वैज्ञानिक डॉ. वीरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन एवं नेतृत्व में विकसित किया गया है। किसानों को मेंथा की पुरानी प्रजातियों की अपेक्षा 22 प्रतिशत तक अधिक उपज प्राप्त होगी। -डॉ. आरसी पडलिया, प्रभारी वैज्ञानिक, केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान, पंतनगर

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