पंतनगर। अब वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड में भी पौष्टिक मखाने की खेती हो सकेगी। इसके लिए पंतनगर विवि के वैज्ञानिकों ने कमर कस ली है। परियोजना के प्रथम चरण में प्रसार विभाग से जुड़े वैज्ञानिक कृषि और उद्यान विभाग के कर्मियों सहित जिले के लगभग सौ किसानों को बुधवार से मखाने की खेती का प्रशिक्षण देने जा रहे हैं। उन्हें दिसंबर से तालाब आवंटित कर काशीपुर, देहरादून, हरिद्वार स्थित कृषि विज्ञान केंद्रों की देखरेख में मखाने की खेती शुरू करवाई जाएगी।
पंतनगर विवि के निदेशक प्रसार शिक्षा डॉ जितेंद्र क्वात्रा ने बताया कि तालाब-पोखर में बहुत जटिल प्रक्रिया से होने वाली मखाने की खेती मुख्यतः एमपी और बिहार में की जाती है। मखाना में प्रोटीन और फाइबर के साथ कैल्शियम, मैग्निशियम, आयरन और फॉस्फेरस प्रचुर मात्रा में होता है और एंटी ऑक्सिडेंट से भी भरपूर होता है। मखाना सूजन और पुरानी बीमारी से बचाता है। मखाने से कई तरह से व्यंजन बनाए जा सकते हैं। इसे खीर, स्नैक्स या डेजर्ट के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।
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मखाने के सेवन से होने वाले लाभ और नुकसान
डॉ. क्वात्रा ने बताया कि मखाना हृदय रोग, शारीरिक शक्ति, फीलपांव, पेशाब करने में परेशानी, नाभि के रोग, चेहरे पर झुर्रियों, शरीर में कैल्शियम की कमी, मजबूत मांसपेशियों और शरीर से हानिकारक टॉक्सिक हटाने में बेहद मुफीद होता है। अधिक मात्रा में सेवन करने से यह नुकसानदायक हो सकता है। इससे कब्ज, पेट फूलना और सूजन भी हो सकती है। यह शरीर में अत्यधिक गर्मी पैदा करता है। गर्भावस्था में अधिक मखाना खाने से गर्भ में पल रहे शिशु को नुकसान पहुंच सकता है। शुगर के मरीजों को भी मखाना खाने से पहले डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। संवाद