खटीमा के पंथागोठ गांव में भोजन करते बच्चे
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प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था सुचारू करने के दावे तो खूब हो रहे हैं, लेकिन बच्चों को न सुविधाएं मुहैया कराई जा रही है न सुरक्षा। खटीमा वन रेंज में बसे पंथागोठ में विद्यालय के बच्चे टिनशेड में पढ़ रहे हैं। शौचालय न होने की वजह से उन्हें जगबुढ़ा नदी किनारे जंगल में जाना पड़ता है। इससे वन्य जीवों के हमले का डर बना रहता है।
ब्रिटिशकाल से ही तराई के जंगलों में गोठ खत्ते अस्तित्व में हैं। सर्दियों में यहां पर्वतीय क्षेत्रों के पशुपालक अपने पशुओं को लेकर परिवार सहित यहां आ जाते थे। गर्मियों में वापस लौटते थे। आजादी के बाद यहां पर बसासत शुरू हो गयी। इन्हीं में एक है पंथागोठ। करीब 55 परिवार वाले इस गांव में शिक्षा गारंटी केंद्र की स्थापना 13 साल पहले की गई। 2012 में शिक्षा गारंटी केंद्र को सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्राथमकि विद्यालय में उच्चीकृत किया गया। तभी से टिनशेड में संचालित किया जा रहा है।
विद्यालय की न चहारदीवारी है न शौचालय की व्यवस्था। बच्चे शौच के लिए जगबुड़ा नदी के किनारे जंगल की ओर जाते हैं। इस जंगल में हाथी और तेंदुओं का भी भय बना रहता है। विद्यालय में 29 बच्चे पंजीकृत हैं। खंड शिक्षाधिकारी सोनी मेहरा कहती हैं कि वन विभाग से जमीन विद्यालय के नाम स्थानांतरित न होने से स्कूल में निर्माण कार्य नहीं हो पा रहा है। जो भी सुविधाएं हमारे स्तर से हो सकती हैं। वह विद्यालय को उपलब्ध कराई जा रही है।
एक ही तहसील में अलग-अलग है वन कानून
पंथागोठ के लोग वोट बैंक कम होने का खामियाजा भुगत रहे हैं। एक ही तहसील में दो-दो वन कानून चल रहे हैं। एक ओर घने जंगलों के बीच बसे सरपुड़ा राजस्व ग्राम के तोक बग्घा 54 में सांसद आदर्श ग्राम के चलते सारी सुविधाएं लागू की जा रही हैं। यहां इंटर कालेज, डेयरी भवन, बारातघर, सीसी रोड, विद्युतीकरण, बीएसएनएल टावर, गेहूं, धान खरीद केंद्र सहित तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं। वहीं पंथागोठ गांव में एक ईंट तक वन विभाग नहीं लगाने दे रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण यहां की बेहद कम आबादी होना है, जो बड़ा वोट बैंक नही है।