रुद्रपुर। आबादी के लिहाज से बड़ी कोतवाली रुद्रपुर संगीन अपराधों के साथ ही तराई में सांप्रदायिक तनाव के लिहाज से भी बेहद संवेदनशील है।
आजादी के पहले तक किच्छा थाने के अंतर्गत रुद्रपुर चौकी के रूप में जुड़ा था। आजादी के बाद आबादी बढ़ने के साथ ही यह थाना और फिर कोतवाली में बदल गई। राजनैतिक और अन्य मामलों में कई नेता इसी कोतवाली से जेल जा चुके हैं। कोतवाली से कई बदमाश सुधरे तो कई नेता जेल जाकर चमके भी।
वर्तमान में रुद्रपुर विधानसभा के अलावा किच्छा, गदरपुर, पंतनगर विधानसभा के कुछ क्षेत्र भी कोतवाली के अंतर्गत आते हैं। दरअसल आजादी के पूर्व रुद्रपुर पुलिस चौकी तराई के पुराने थानों में से एक किच्छा थाने के अंतर्गत आती थी। पुराने अस्पताल के पास बनी पुलिस चौकी में पुलिसकर्मी तैनात रहते थे, लेकिन आजादी के बाद आबादी बढ़ने से थाने की जरूरत महसूस हुई तो करीब 1958 में रुद्रपुर को थाना बना दिया गया।
कोतवाली से मिली जानकारी के अनुसार 1970 में रामपुर रोड पर थाने का भवन बना था और 1978 में यह थाने से कोतवाली में बदल गई। तब कोतवाली के अंतर्गत ट्रांजिट कैंप और बाजार चौकी ही थी। लेकिन धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों की आबादी बढ़ी तो चौकियां खोल दी गईं।
वर्ष 2005 में दिनेशपुर और पंतनगर के थाना बनने के बाद यह क्षेत्र रुद्रपुर कोतवाली से अलग हो गया। उस वक्त कोतवाली के अंतर्गत रम्पुरा, आदर्श कालोनी चौकी, ट्रांजिट कैंप, बाजार चौकी आती थी। लेकिन दिसंबर 14 में ट्रांजिट कैंप थाने के अस्तित्व में आने के बाद अब कोतवाली में बाजार, आदर्श कालोनी और रम्पुरा चौकी जुड़ी हुई है। कोतवाली क्षेत्र अंतर्गत में हत्या, लूट, बलात्कार, डकैती, बाइक चोरी सहित अनेक घटनाएं होती रही हैं।
सिडकुल बढ़ने के साथ ही आपराधिक घटनाओं में तेजी भी आई है। लेकिन 1991 में आतंकवाद के दौर में हुए बम विस्फोट में 50 से अधिक लोगों के मारे जाने और 2 अक्टूबर 2011 को शहर में सांप्रदायिक तनाव के बाद दंगों की कडुवी घटनाएं भी जुड़ी हैं। हालांकि अपराधों से इतर कई राजनैतिक हस्तियां भी कई मामलों में जेल जा चुके हैं।