सवा महीने से मैगी का उत्पादन बंद रहने से नेस्ले फैक्ट्री से जुड़ी दर्जनों मिलों और वेंडरों की सेहत खराब हो गई है। मांग न आने से मिलें और वेंडर बंदी के कगार पर हैं।
इन छोटी कंपनियों से जुड़े श्रमिकों पर भी रोजगार छिनने का संकट गहरा गया है। अब सभी की निगाहें न्यायालय के फैसले पर टिकी हैं। हालांकि फैसले से जुड़े लोगों को राहत मिलने की उम्मीद है।
गौरतलब है कि देशभर में मैगी के खिलाफ चले अभियान के बाद राज्य में भी मैगी के उत्पादन, भंडारण और वितरण पर रोक लगाई जा चुकी है।
प्रदेश के खाद्य आयुक्त ओमप्रकाश के तीन जून को जारी निर्देश के बाद सिडकुल पंतनगर स्थित नेस्ले फैक्ट्री में चार जून से उत्पादन बंद है।
नेस्ले की बंदी का असर बड़े पैमाने पर फ्लोर, तेल मिलों के अलावा अन्य वेंडरों पर पड़ने लगा है। सवा महीने से इन मिलों और वेंडरों की मांग में भारी गिरावट आ गई है।
नेस्ले सूत्रों के अनुसार पंतनगर फैक्ट्री में रोजाना करीब तीन सौ टन मैगी का उत्पादन किया जाता था। इसमें प्रयुक्त होने वाले मैदा, तेल, मसाला विभिन्न स्थानीय तेल और फ्लोर मिलों से मंगाया जाता है, जबकि मैगी पैक करने के लिए लेमिनेशन, गत्ता की भी बड़ी मात्रा में जरूरत पड़ती है। इसकी आपूर्ति छोटे-छोटे उद्योगों के जरिए कराई जाती है।
सूत्रों के अनुसार दर्जन भर फ्लोर, तेल मिलों के अलावा इतनी ही वेंडर कंपनियों से नेस्ले को कच्चे माल की सप्लाई दी जाती है, लेकिन सवा महीने से बंदी की मार झेल रही नेस्ले फैक्ट्री का असर इससे जुड़ी मिलों और वेंडर इकाइयों पर पड़ने लगा है। मांग न आने से फ्लोर मिल, तेल मिल और तमाम वेंडर बुरी तरह से प्रभावित हो गए हैं।
वहीं इन मिलों और वेंडर इकाइयों से जुड़े श्रमिकों को भी निकाले जाने की चिंता सता रही है। ऐसे में सभी को न्यायालय का फैसला आने का बेसब्री से इंतजार है।