अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान को केंद्र ने दी हरी झंडी
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पिछले एक पखवाड़े से लगातार बढ़ रहे डीजल के दाम धान के काश्तकारों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। उत्तराखंड में साढ़े छह सौ लाख एकड़ भूमि पर धान की खेती होती है। बढ़ी हुई कीमतों के अनुसार, धान रोपाई के लिए खेत तैयार करने के लिए राज्य के किसानों पर 67.57 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
उत्तराखंड के तराई-भाबर और हरिद्वार जिले में धान की फसल बहुतायत में होती है। राज्य में कुल 262.8 लाख हेक्टेयर अर्थात 649.11 लाख एकड़ भूमि पर धान की खेती होती है। एक ओर जहां केंद्र सरकार काश्तकारों की आय दोगुनी करने का दंभ भर रही है। वहीं कर्नाटक चुनाव के बाद पिछले 15 दिनोें में डीजल के दाम 66.20 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर 69.67 रुपये पहुंच गए हैं। यानी इस दौरान डीजल के दामों पर 3.47 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई है।
धान की खेती के लिए फसल तैयार करने के लिए तीन बार हैरो से जुताई, एक बार कादल व उसके बाद पटेला (लेबरर) कर भूमि को समतल किया जाता है। इसके लिए मेढ़ बांधने में डीजल खर्च अलग से होता है। एक एकड़ भूमि तैयार करने में औसतन 30 से लेकर 32 लीटर तक डीजल खर्च हो जाता है। अर्थात काश्तकार पर प्रति एकड़ 110 से 120 रुपये तक अतिरिक्त भार पड़ेगा। राज्य में धान के कुल प्रस्तावित रकबे पर किसानों को बढ़ी हुई डीजल की कीमतों के अंतर का करीब 67.57 करोड़ रुपये अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ेगा। रोपाई के बाद जो काश्तकार सिंचाई के लिए डीजल इंजन का प्रयोग करते हैं। उनकी फसल का लागत मूल्य काफी हद तक बढ़ जाएगा।
डीजल के दाम बढ़ने से किसानोें पर भी आर्थिक बोझ बढ़ेगा। सरकार को काश्तकारों को डीजल पर सब्सिडी देनी चाहिए। ताकि फसल की उत्पादन लागत कम हो।
-देवेंद्र बिष्ट, गढ़वाल ब्लॉक, कुंडेश्वरी, काशीपुर।
यह काश्तकारों के साथ सरासर अन्याय है। सरकार को डीजल पर लगाए गए टैक्स कम करने चाहिए। साथ ही डीजल के दामों का निर्धारण कृषि और व्यवसायिक प्रयोजन के लिए अलग-अलग होना चाहिए।
-रवि डोगरा, पूर्व ब्लॉक प्रमुख कुंडा
खाद का मूल्य पहले से ही बढ़ा है। अब डीजल के दामों में वृद्धि ने भी काश्तकारों की कमर तोड़ दी है। उत्पादन लागत बढ़ने से किसानों को आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है।
-अर्जुन सिंह ग्राम कुदईंयावाला