पारंपरिक खेती से परेशान होकर जब स्वेतांशु ने बागवानी को अपनाया, तो उनकी जमीन ने सोना उगलना शुरू कर दिया। आज वे सिर्फ नर्सरी से 25 से 30 लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं और बगीचे से प्रति एकड़ एक लाख 40 हजार रुपये मुनाफा बना रहे हैं। इस सफर में मुश्किलें थीं, लेकिन काम के प्रति उनके जज्बे ने राह को आसान कर दिया।
काशीपुर-रामनगर के बॉर्डर स्थित कामदेवपुर में स्वेतांशु चतुर्वेदी का करीब 30 एकड़ में बगीचा है और साढ़े चार एकड़ में नर्सरी है। स्वेतांशु ने बताया कि छह वर्ष की उम्र में पिता का निधन हो गया था। ग्रेजुएशन के बाद उनपर पारिवारिक जिम्मेदारी के चलते उन्हें खेती शुरू करनी पड़ी। शुरुआत में उन्होंने सभी की तरह धान, गेहूं, और गन्ने की खेती की। लेकिन कभी बारिश नहीं, तो कभी खाद नहीं मिलने से परेशानी होती थी। बीज नहीं मिलते और फसल बेचने जाओ तो लागत भी नहीं निकलती थी।
स्वेतांशु ने बताया कि बगीचे मेंएग्जॉटिक मैंगों एरिया में आम की करीब 13 वैरायटी हैं। इनमें अरुणिमा, अरुणिका, गुजरात का केसर, लालिमा, श्रेष्ठ, आम्रपाली, पितांबर, मल्लिका जैसी वैरायटी हैं। केसर गुजरात की वैरायटी है। गुजरात के लोग इसी आम को खाना पसंद करते हैं। इस लिए इसकी सप्लाई की डिमांड अधिक रहती है। साथ ही अमरूद की मृग बहार वैरायटी तैयार की है। इसकी खासियत यह है कि इसके फल फरवरी-मार्च में तैयार होते हैं।
देश-विदेश से आ रही लीची की डिमांड
स्वेतांशु ने बताया कि वह लीची ग्रोवर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सचिव हैं। साथ ही रामनगर लीची एसोसिएशन के प्रेसीडेंट हैं। उन्होंने बताया कि जीआई टैग मिलने की वजह से लीची के खरीदार देश-विदेश से संपर्क कर रहे हैं। लेकिन इसे दूर ले जाने में एक चुनौती आ रही है। दरअसल, लीची को कंट्रोल क्लाइमेट में पांच डिग्री के तापमान पर पैक करना पड़ता है। इसके लिए पैक हाउस की आवश्यकता है। पैक हाउस बनाने के लिए सरकार से सहयोग की उम्मीद करते हैं।
125 रुपये में आम की रंगीन वैरायटी का पौधा