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Uttarakhand: बदली तकदीर...पारंपरिक खेती छोड़ स्वेतांशु ने बनाई बागवानी से पहचान, सालाना कमाई 30 लाख

Mon, 25 Aug 2025 01:30 PM IST
हीरा मेहरा आदर्श सिंह, अमर उजाला

सार

पारंपरिक खेती से परेशान होकर स्वेतांशु ने बागवानी को अपनाया, तो उनकी जमीन ने सोना उगलना शुरू कर दिया। आज वे नर्सरी से 25 से 30 लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं।
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स्वेतांशु चतुर्वेदी। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पारंपरिक खेती से परेशान होकर जब स्वेतांशु ने बागवानी को अपनाया, तो उनकी जमीन ने सोना उगलना शुरू कर दिया। आज वे सिर्फ नर्सरी से 25 से 30 लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं और बगीचे से प्रति एकड़ एक लाख 40 हजार रुपये मुनाफा बना रहे हैं। इस सफर में मुश्किलें थीं, लेकिन काम के प्रति उनके जज्बे ने राह को आसान कर दिया।

 

काशीपुर-रामनगर के बॉर्डर स्थित कामदेवपुर में स्वेतांशु चतुर्वेदी का करीब 30 एकड़ में बगीचा है और साढ़े चार एकड़ में नर्सरी है। स्वेतांशु ने बताया कि छह वर्ष की उम्र में पिता का निधन हो गया था। ग्रेजुएशन के बाद उनपर पारिवारिक जिम्मेदारी के चलते उन्हें खेती शुरू करनी पड़ी। शुरुआत में उन्होंने सभी की तरह धान, गेहूं, और गन्ने की खेती की। लेकिन कभी बारिश नहीं, तो कभी खाद नहीं मिलने से परेशानी होती थी। बीज नहीं मिलते और फसल बेचने जाओ तो लागत भी नहीं निकलती थी।

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उन्होंने बताया कि उनके पास एक ढाई एकड़ का लीची और अमरूद का बगीचा था, उसमें पारंपरिक खेती से ज्यादा मुनाफा होता था। एक एकड़ में खेती से जहां 15 हजार रुपये बचते, वहीं, उस ढाई एकड़ के बगीचे से 25 हजार रुपये प्रति एकड़ तक मिल जाते। उन्होंने कहा कि वहीं से पारंपरिक खेती को खत्म करके 15 एकड़ में लीची और आम का बगीचा तैयार कर दिया। बगीचे में धान और गेहूं की खेती भी करता था। लेकिन धान में पानी भरा रहता था, जिससे पेड़ गलने शुरू हो गए। इसके बाद धान-गेहूं को हटाकर अमरूद के पौधे लगाने शुरू कर दिए। नर्सरी से खरीदकर अमरूद के पौधे लगाए, लेकिन वह खराब निकल गए। इसके बाद अपनी नर्सरी तैयार करने का फैसला लिया और वहीं से नर्सरी में अलग-अलग वैरायटी के पौधे तैयार करने लगा। धीरे-धीरे दूसरों ने भी नर्सरी से पौधे खरीदने शुरू कर दिए।

 

स्वेतांशु ने बताया कि बगीचे मेंएग्जॉटिक मैंगों एरिया में आम की करीब 13 वैरायटी हैं। इनमें अरुणिमा, अरुणिका, गुजरात का केसर, लालिमा, श्रेष्ठ, आम्रपाली, पितांबर, मल्लिका जैसी वैरायटी हैं। केसर गुजरात की वैरायटी है। गुजरात के लोग इसी आम को खाना पसंद करते हैं। इस लिए इसकी सप्लाई की डिमांड अधिक रहती है। साथ ही अमरूद की मृग बहार वैरायटी तैयार की है। इसकी खासियत यह है कि इसके फल फरवरी-मार्च में तैयार होते हैं।

देश-विदेश से आ रही लीची की डिमांड
स्वेतांशु ने बताया कि वह लीची ग्रोवर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सचिव हैं। साथ ही रामनगर लीची एसोसिएशन के प्रेसीडेंट हैं। उन्होंने बताया कि जीआई टैग मिलने की वजह से लीची के खरीदार देश-विदेश से संपर्क कर रहे हैं। लेकिन इसे दूर ले जाने में एक चुनौती आ रही है। दरअसल, लीची को कंट्रोल क्लाइमेट में पांच डिग्री के तापमान पर पैक करना पड़ता है। इसके लिए पैक हाउस की आवश्यकता है। पैक हाउस बनाने के लिए सरकार से सहयोग की उम्मीद करते हैं।

 

 

125 रुपये में आम की रंगीन वैरायटी का पौधा

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एग्जॉटिक व सामान्य पौधों की उत्तराखंड से बाहर क्षेत्र में भी बिक्री होती है। पौधों की गवर्नमेंट सप्लाई होती है। पिथौरागढ़, बागेश्वर में लीची के पौधे जाते हैं। गढ़वाल और कुमाऊं में आम और अमरूद के पेड़ जाते हैं। यूपी के मुजफ्फरनगर, शामली और मेरठ में लीची के पौधे जाते हैं। सालाना 45 हजार पौधे लीची, अमरूद, आम के सप्लाई हो रहे हैं। एक आम के रंगीन एग्जॉटिक पौधे की 125 रुपये कीमत है। वहीं, लीची का 60 और अमरूद के पौधे का 75 रुपये दाम है।

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