काशीपुर। जिस बिच्छू घास को लोग घरों, खेतों के आसपास उगने नहीं देते हैं, अब लोग मुनाफा कमाने के लिए बिच्छू घास (कंडाली) की खेती करेंगे। इसके फाइबर को कॉटन में मिला कर धागा/कपड़ा बनेगा। आईजीएल निवासी नेहा केष्टवाल के अनुसंधान से यह संभव हो रहा है।
पर्वतीय क्षेत्रों में बिच्छू घास गांवों के आसपास, गधेरों में पैदा होती है। इसके पत्तों पर काटे होते हैं। इनके चुभने से बिच्छू के डंक मारने जैसी जलन होती है। यह लोगों की नजर में तिरस्कृत पौधा है जो झाड़ियों के रूप में उगता है। राष्ट्रीय संस्थान एवं फैशन टेक्नोलॉजी (निफ्ट) मुंबई से डिजाइनिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त आईजीएल निवासी नेहा ने बिच्छू घास पर शोध किया है।
नेहा ने प्राकृतिक बिच्छू घास से उच्च स्तर पर फाइबर बनाने में सफल रही है। शोध में बिच्छू घास के रेशों को वर्तमान में उपयोग होने वाले कॉटन के साथ मिश्रित कर उच्च स्तर का फाइबर बनाने मे सफल रही है। नेहा ने बताया कि बिच्छू घास का फाइबर कॉटन की अपेक्षा कम सिकुड़ता है। उन्होंने आईजीएल काशीपुर की प्रयोगशाला में इसका सफल परीक्षण किया है।
इसमें 100 प्रतिशत नैटल की सिकुड़न 3.36 प्रतिशत एवं कॉटन की सिकुड़न 13.6 प्रतिशत थी। इससे यह मालूम हुआ कि अगर नैटल फाइबर को कॉटन के साथ मिला कर धागा/कपड़ा बनाया जाए तो कॉटन की सिकुड़न क्षमता को कम किया जा सकता है। इससे कॉटन की खपत भी कम होगी।
उच्च क्वालिटी का कपड़ा तैयार होगा। कॉटन में उपयोग होने वाले पेस्टिसाइड की खपत कम होगी। इससे पर्यावरण में प्रदूषण कम किया जा सकता है। नेहा ने कहा कि पहाड़ों में पैदा होने वाले बिच्छू घास से तैयार फाइबर का उपयोग कपड़ा बनाने में काम आने लगे तो इससे लोगों को रोजगार मिलेगा।
किसान बिच्छू घास को आसानी से अपने खेतों में उगा सकता है। नेहा ने कहा कि बिच्छू घास पर अनुसंधान मेें उनकी मेंटर डॉ. रीना अग्रवाल (नीफ्ट) मुंबई टेक्सटाइल, उत्तराखंड हैंडलूम डेवलपमेंट बोर्ड देहरादून के सीइओ सुधीर नौटियाल, उत्तराखंड बैंबू एवं फाइबर डेवलेपमेंट बोर्ड देहरादून के मैनेजर डीसी जोशी ने सहयोग किया।