मतुआ धर्म के संस्थापक ठाकुर हरिचांद के 206 वें जन्मोत्सव के अवसर पर बुधवार से हरिमंदिर परिसर में तीन दिनी मतुआ महामेला शुरू हो गया। पहले दिन गंगा पूजन कार्यक्रम में भारी संख्या में महिलाओं ने भागीदारी की। बृहस्पतिवार को महावारूणी पर्व के अवसर पर मधुकृष्ण त्रयोदशी महायोग में तिथि लग्नानुसार दोपहर 12 बजे से देशभर से आए हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर स्थित कामना सागर में डुबकी लगाएंगे।
बुधवार को प्रभात कीर्तन के बाद आचार्य गोपाल महाराज और उनके शिष्य विवेकानंद बृह्माचारी की देखरेख में निशान उत्तोलन कार्यक्रम संपन्न हुआ। इसके बाद ढोल, नगाड़ों और शंख की मंगल ध्वनि के बीच महिलाओं ने मंदिर परिसर में स्थित कामना सागर की परिक्रमा के बाद मां गंगा की पूजा अर्चना की। दोपहर को मंदिर परिसर में मंगल घट की स्थापना की गई। बुधवार रात हरिनाम कीर्तन का आयोजन हुआ।
मंदिर परिसर के आसपास विशाल मेला लगा है। बृहस्पतिवार को महावारूणी स्नान महोत्सव में हजारों की भीड़ जुटने की संभावना को देखते हुए पुलिस ने भी सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए हैं। देशभर से टोलियों में हरिभक्तों का मंदिर पहुंचने का सिलसिला जारी है। सुदूरवर्ती प्रांत अंडमान निकोबार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, दिल्ली, छत्तीसगढ़ से श्रद्धालु पहुंच चुके हैं।
दलितों और शोषितों के उत्थान के लिए समर्पित रहे ठाकुर हरिचांद
महावारूणी स्नान महोत्सव हरिचांद गुरूचांद मतुआ संप्रदाय का प्रमुख पर्व है। 1812 में हरिचांद गुरूचांद मतुआ मिशन के संस्थापक हरिचांद ठाकुर का जन्म इसी दिन पूर्वी बंगाल के ओड़ाकांदी गांव में पंडित जसोमंत के घर हुआ था। दलितों शोषितों के उद्धार के लिए उन्होंने मतुआ मिशन की स्थापना की। 1878 में मृत्यु के बाद उनकी याद में 1880 से ओड़ाकांदी में महावारूणी स्नान की शुरूआत हुई।
ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी हरिचांद ठाकुर ने जीवन भर दबे-कुचले, शोषित लोगों के लिए संघर्ष किया। इनके सामाजिक और धार्मिक उत्थान के लिए ही उन्होंने मतुआ संप्रदाय की स्थापना कर एक समाज सेवा का काम शुरू किया। उनके कार्य से प्रभावित होकर एक अंग्रेज अधिकारी उनके अनुयायी बने। बाद में इस अंग्रेज अधिकारी ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में दलितों पर सवर्णों के अत्याचार का मामला उठाकर उस पर रोक लगाने की मांग की। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने आदेश जारी कर दलितों पर अत्याचार बंद करने, उन्हें चंडाल के नाम से पुकारने या लिखने पर पाबंदी लगा दी।
हरिचांद ठाकुर के अथक प्रयास से ही दलितों को चंडाल नाम से मुक्ति मिली और तभी से उन्हें नमो: शूद्र कहकर पुकारा जाने लगा। हरिचांद ठाकुर ने 1878 में मानव शरीर को त्याग दिया। बाद में उनके पुत्र गुरूचांद ठाकुर इस संप्रदाय के धर्म गुरू बने और उन्होंने 1880 में महावारूणी स्नान की शुरूआत की। दिनेशपुर में 1983 में आचार्य गोपाल महाराज ने हरिमंदिर की स्थापना की और तभी से यहां महावारूणी स्नान हो रहा है। मान्यता है कि मधुकृष्ण त्रयोदशी महायोग में कामना सागर में डुबकी लगाने पर पापों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।