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मालू को मिली नई पहचान: रेशों से बनेगा पर्यावरण अनुकूल कपड़ा, घरेलू साज-सज्जा में भी हो सकेगा इसका उपयोग

Tue, 27 Oct 2026 12:05 PM IST
Heera सुरेंद्र कुमार वर्मा

सार

उत्तराखंड में बहुतायत पाए जाने वाले उपेक्षित मालू पौधे के रेशों से पंतनगर विवि के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण अनुकूल मालू-विस्कोस फैब्रिक विकसित किया, जिसका पेटेंट सितंबर में हासिल हो चुका है।
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पहाड़ में मालू का पौधा - फोटो : अमर उजाला
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उत्तराखंड के पहाड़ों में बहुतायत पाया जाने वाला मालू (बौहिनिया वाह्रली) का पौधा अब तक उपेक्षित प्राकृतिक संसाधन रहा है। जिसका उपयोग केवल रस्सियां बनाने या पत्तलों व प्रसिद्ध सिंगौड़ी मिठाई की पैकिंग तक सीमित था। पंतनगर विवि के वैज्ञानिकों ने इस पौधे के रेशों से पर्यावरण अनुकूल वस्त्र तैयार करने में क्रांतिकारी उपलब्धि हासिल की है। विवि को बीते सितंबर इस मालू-विस्कोस फैब्रिक नवाचार का पेटेंट भी हासिल हो गया है।

जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की पूर्व पीएचडी छात्रा (वर्तमान में सहायक प्राध्यापक निफ्ट जोधपुर) डॉ. रुचि खोलिया ने महाविद्यालय की अधिष्ठात्री प्रो. अलका गोयल के मार्गदर्शन में किए गए शोध मालू के रेशों का पृथक्करण और मालू-विस्कोस से नवीन मिश्रित कपड़े का विकास करने के लिए भारत सरकार ने उन्हे पेटेंट प्रदान किया है। उनका यह शोध हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाने वाले मालू के पौधे का वैज्ञानिक उपयोग कर पर्यावरण अनुकूल वस्त्र तैयार करने में एक बड़ी उपलब्धि है। डाॅ. रूचि ने बताया कि इस शोध के माध्यम से मालू के बास्ट रेशों को विस्कोस रेयान के साथ मिलाकर एक उच्च गुणवत्ता वाला मिश्रित कपड़ा तैयार किया गया है। यह नवाचार मालू के रेशों को घरेलू साज-सज्जा, फर्निशिंग फैब्रिक और टेक्सटाइल के क्षेत्र में एक टिकाऊ विकल्प के रूप में स्थापित करता है।

ग्रामीण आजीविका सहित पलायन रोकने में भी निर्णायक

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डाॅ. रूचि ने बताया कि यह तकनीक उत्तराखंड के ग्रामीण, पिछड़े और जनजातीय क्षेत्रों में रोजगार सृजन और आजीविका संवर्धन का एक सशक्त माध्यम बनेगी। मालू के निष्कर्षण और प्रसंस्करण पर आधारित लघु व कुटीर उद्योग स्थापित करके बहुत कम लागत में ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों के लिए स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यह पहल पर्वतीय संसाधनों के सतत उपयोग के साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने और पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन रोकने में भी निर्णायक साबित होगी। 

मालू के पत्ते बीपी रोगियों के लिए रामबाण
डाॅ. रूचि ने बताया कि मालू, जिसे कैमल्स फुट क्लाइंबर भी कहा जाता है, न केवल रेशे प्रदान करता है बल्कि औषधीय रूप से भी अत्यंत उपयोगी है। इसके पत्तों का प्रयोग ब्लड शुगर (हाइपरग्लाइसेमिया) के नियंत्रण और बीजों का उपयोग स्वास्थ्य टॉनिक के रूप में भी किया जाता है। वस्त्र उद्योग में इसका यह वैज्ञानिक प्रयोग पर्वतीय वनस्पतियों के बहुआयामी एवं सतत उपयोग की दिशा में एक नया अध्याय जोड़ता है। संवाद

यह नवाचार हरित प्रौद्योगिकी, सतत फैशन और ग्रामीण पुनरुद्धार के राष्ट्रीय लक्ष्यों के पूर्णतः अनुकूल है। स्थानीय जंगली वनस्पतियों को व्यावसायिक वस्त्र उत्पादों में बदलकर विवि शैक्षणिक अनुसंधान, पर्यावरणीय स्थिरता और सामुदायिक सशक्तिकरण के बीच की दूरी पाटने का कार्य निरंतर कर रहा है। -डॉ. एसके कश्यप, कुलपति-पंतनगर विवि।

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