वसंत आगमन के साथ ही देवभूमि उत्तराखंड में होली का रंग चढ़ने लगा है। माना जाता है कि कुमाऊंनी बैठकी होली की शुरूआत अल्मोड़ा नगरी से हुई थी। इस शैली को रामपुर घराने के उस्ताद अमानतुल्लाह खान ने दिया था। इसके करीब 1950-60 से प्रारंभ होने की जानकारी मिलती है।
काशीपुर के किला निवासी होल्यार चक्रेश जैन बताते हैं कि काशीपुर में भी लगभग 60 वर्षों से बैठकी होली होने की जानकारी मिलती है। यहां पर होली गायन के प्रचार-प्रसार में स्व. गौरीदत्त भंडारी, नाथूराम जोशी, मास्टर गुलाब सिंह, गोपाल दत्त पंत, मोहन दत्त पंत, मास्टर किशोरी लाल शर्मा, पद्मा दत्त पांडे, अरविंद पंत, गणेश दत्त पांडे, पूरन लोहनी, यज्ञ दत्त जोशी और एडवोकेट संत शरण माथुर ने अपना योगदान दिया। वर्तमान में मोहित उपाध्याय, योगेश जोशी, डीसी पांडे, गिरजा पांडे, नीरज पंत, बसंत बिष्ट, शोभित गुड़िया, मनमोहन अग्रवाल और विजेंद्र कंडवाल आदि इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
बैठकी होली में यहां हारमोनियम, तबला और वायलिन आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। संपूर्ण बैठकी होली, गायन शास्त्रों के अनुरूप शुद्ध रागों में गाई जाती है। इसमें धमार, हमीर, जंगला काफी, केदार, यमन, बागेश्री, गौड़ सारंग, ध्रुपद, रसिया और वसंत राग का विशेष महत्व है। वसंत पंचमी से होलिका दहन तक यहां बैठकी होली का दौर चलता है। होली गायन पशुपतिनाथ शिव की आराधना के साथ-साथ ब्रज के राधाकृष्ण की हंसी-ठिठोली से भी सराबोर होता है। अंत में आशीष वचनों के साथ होली गायन का समापन होता है।