पान सिंह पाडियार भले ही अब नहीं रहे हैं, लेकिन उनके कोल्हू के बने गुड़ का जायका आज भी लोगों की जुबान पर कायम है। आज भी उस गुड़ का स्वाद उतनी ही मिठास लिए है, जितनी कई साल पहले हुआ करती थी। पिता के काम को बेटे मोहन ने आगे बढ़ाया। हालांकि बैल की जगह अब कोल्हू बिजली से चलता है। लेकिन बाकी सारा तरीका पारंपरिक ही है। बिना केमिकल और मिलावट के तैयार इस गुड़ के चाहने वाले हल्द्वानी से लेकर कौसानी तक हैं। वहां के वैदिक अनामय आश्रम से हर साल यहां से 12 से 15 क्विंटल गुड़ मंगाया जाता है।
* विदेशी भी हैं इस देशी तरीके से बनाए गए गुड़ के मुरीद
* रस की सफाई के लिए कोई तरह रसायन नहीं मिलाते
मोहन सिंह ने बताया कि उन्हें पता भी नहीं है कब उनके पिता ने इस काम को शुरू किया। धंधे में कम मुनाफा देखते हुए एक बार उन्होंने सोचा कि कुछ और काम किया जाए, लेकिन इसी बीच एक बुजुर्ग ने समझाया कि कुछ और काम करके पैसे तो तुम कमा लोगे, लेकिन जो नाम तुम्हारे पिता ने वर्षों की मेहनत के बाद कमाया है उसे तुम कुछ ही दिनों में गंवा दोगे। तब से धंधा बदलने का विचार त्याग दिया है। मोहन सिंह ने बताया कि गुड़ खरीदने के लिए सुबह से ही भीड़ लग जाती है।
ऐसा कम ही होता है, जब किसी रोज उनके वहां एक भेली बच जाए। गुड़ बचाने के लिए हर दूसरे दिन दो से तीन ट्राली गन्ना पान सिंह के कोल्हू पर आता है। चीनी मिल की तरह यहां गन्ना काश्तकारों का भुगतान बकाया नहीं रखा जाता है, यही वजह है कि मोहन सिंह के एक फोन पर काश्तकार गन्ना पहुंचा जाते हैं।
ऐसे बनती है गुड़ की भेली
सबसे पहले गन्ने की पेराई करके रस निकाला जाता है। यह रस एक चार इंची मोटे पाइप के जरिए एक बड़े से कड़ाहे में पहुंचाया जाता है। आग पर चढ़े कड़ाहे पर रस धीरे-धीरे गर्र्म होता है। रस की सफाई के लिए इसमें भिंडी की राल मिलाई जाती है। रस के साफ होने के बाद इसे दूसरे कड़ाहे में डाला जाता है। रस के कुछ गाढ़े होने पर इसे एक तीसरी कड़ाही में काफी गाढ़ा होने तक गर्म किया जाता है। रस के गाढ़ा होने पर इसे निकालकर एक प्लेटनुमा फर्श पर फैलाकर ठंडा होने तक छोड़ दिया जाता है। जब तरल गुड़ कुछ ठंडा हो जाता है, तब दो लोग मिलकर इसे एक कपड़े के नीचे रखकर गूंधते हैं। इसके बाद डेढ़-डेढ़ किलो के गोले बनाकर इसे बेचने के लिए तैयार किया जाता है।
‘हर्बल गुड़’ का स्वाद लाजवाब
मोहन ने बताया कि उनके गुड़ में किसी तरह के रसायन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसकी सफाई से लेकर तैयार होने तक की पूरी प्रक्रिया पारंपरिक तरीके से होती है। जहां अन्य फैक्ट्रियों में गन्ने के रस की सफाई के लिए रसायन इत्यादि का उपयोग किया जाता है, लेकिन उनके यहां रस की सफाई के लिए भिंडी की राल मिलाई जाती है। इसके लिए बकायदा उन्होंने खेत में भिंडी बोई है।