पंतनगर। बिगड़ते पारिस्थितिकी तंत्र और मानव प्रेरित जलवायु असंतुलन से पृथ्वी पर दिन प्रतिदिन नई चुनौतियां बढ़ रही है। तापमान का बढ़ना, हिमनदों का पिघलना और टूटना, मानसून की बारिश और बर्फबारी में कमी, विनाशकारी बाढ़, भूकंप में वृद्धि, फसल चक्र में बदलाव और बीज अंकुरण दर में गिरावट जैसे परिवर्तन इसके उदाहरण हैं।
उत्तराखंड जैव प्रौद्योगिकी परिषद (बॉयोटेक) के वैज्ञानिक डॉ. मणिंद्र मोहन ने बताया कि पृथ्वी के वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन में ईंधनयुक्त वाहनों और संयंत्रों से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड की बड़ी भूमिका है। पर्वतीय इलाकों में अतिदोहन, अनियोजित व अनियंत्रित विकास बड़ी समस्या है, जिससे भूस्खलन की आवृत्ति में इजाफा हो रहा है। नदियां और छोटे जलस्रोतों की धाराएं सिमट रही हैं और पर्वतीय जैव संपदा को नुकसान हो रहा है। पृथ्वी पर खराब हो रही परितंत्र की बहाली और बढ़ती मुश्किलों से पार पाने के लिए मानव केंद्रित व पर्यावरण अनुकूल कार्य करने होंगे।
निरंतर कम हो रही जल उपलब्धता...
चीन के बाद कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन में भारत दूसरे स्थान पर है। डॉ. मणिंद्र ने बताया कि हम सुरक्षित तभी तक हैं, जब तक पृथ्वी और उसके मुख्य घटक सुरक्षित हैं। पृथ्वी पर हवा, पानी और मिट्टी की सेहत बहुत गंभीर है। सतही पानी का 80 फीसदी हिस्सा प्रदूषित है। भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता निरंतर कम हो रही है। वर्ष 2001 में 1816 घनमीटर थी, जिसके 2031 तक घटकर 1367 घनमीटर तक रह जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
ग्रीनहाउस गैस वातावरण के बदलाव का कारण...
पृथ्वी पर बढ़ते तापमान और वातावरण के बदलाव में ग्रीनहाउस गैसों की महत्वपूर्ण (लगभग 45%) भूमिका है। इसमें कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व हैलोकार्बन आदि प्रमुख कारक बन रहे हैं। भारत में प्रति व्यक्ति औसतन कार्बन फुटप्रिंट लगभग 0.56 टन प्रतिवर्ष है। बढ़ते कार्बन फुटप्रिंट से पृथ्वी पर जल, जंगल व जमीन आवश्यकता से अधिक कार्बन डाई ऑक्साइड को नहीं सोख पाते और तापमान में वृद्धि का कारण बनते हैं।
पृथ्वी की रक्षा के लिए अपनाने होंगे यह उपाय
1- अपने हिस्से का पौधरोपण करके।
2- जल की बर्बादी रोककर और वर्षा आधारित जल संरक्षण को बढ़ावा देकर।
3- प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे को मृदा, जल और वायु में जाने से रोककर।
4- प्राकृतिक धरोहरों जैसे नदी, पहाड़, जंगल और जैवविविधता को मानवीय छेड़छाड़ से दूर रखकर।
5- खेती किसानी में खतरनाक और प्रतिबंधित कीटनाशकों/रसायनों का उपयोग बंद करके।
6- वायु प्रदूषण के कारकों पर प्रतिबंध लगाकर।
7- सोलर एनर्जी, मानव केंद्रित व पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों को बढ़ावा देकर।