पंतनगर। पंतनगर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जे कुमार ने कहा कि वैज्ञानिकों को सोयाबीन की नई किस्मों एवं तकनीकों का विकास करना चाहिए। ऐसी तकनीकें विकसित की जाएं, जिन्हें अपनाकर किसान लाभ उठा सकें। डॉ. कुमार मंगलवार को सोयाबीन की अखिल भारतीय समन्वित शोध परियोजना की 47वीं वार्षिक समूह बैठक के उद्घाटन सत्र में अध्यक्षीय भाषण दे रहे थे।
उन्होंने कहा कि सोयाबीन तेल एवं प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत है, जिसके द्वारा देश में प्रोटीन कुपोषण को दूर किया जा सकता है। सोयाबीन में मौजूद अनेक पौष्टिक तत्वों के कारण इससे आदर्श भोज्य पदार्थों का निर्माण किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि पंतनगर विश्वविद्यालय द्वारा विकसित सोयाबीन की विकसित 23 प्रजातियों में से तीन प्रजातियों को लैंडमार्क प्रजातियों का दर्जा मिला है, इनमें अंकुर, शिलाजीत, पीके 462 शामिल हैं।
मुख्य अतिथि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक (तिलहन एवं दलहन) डॉ. एसके चतुर्वेदी ने कहा कि वैज्ञानिकों को बाजार एवं उद्योग की आवश्यकता के अनुरूप शोध करना चाहिए। उन्होंने सोयाबीन पर किये जा रहे शोध कार्यक्रमों के प्रभावों का विश्लेषण करने की सलाह भी दी। किसानों द्वारा अपनाए जाने वाली नई प्रजातियों के आंकडे़ भी एकत्रित करने के लिए कहा।
डॉ. चतुर्वेदी ने सोयाबीन के प्रजनक बीज को ऑफ सीजन में उत्पादित करने पर बल दिया ताकि गुणवत्तायुक्त बीज की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। पंतनगर में सोयाबीन शोध के 50 साल पूरे होने पर ‘फाइव डिकेड्स ऑफ सोयाबीन रिसर्च’ बुलेटिन का विमोचन भी किया गया।
भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान इंदौर के निदेशक डॉ. बीएस भाटिया, पंतनगर विश्वविद्यालय में विजिटिंग वैज्ञानिक डॉ. बीबी सिंह, परियोजना के प्रभारी डॉ. एएन शर्मा, निदेशक शोध डॉ. जेपी सिंह, परियोजना के मुख्य अन्वेषक एवं कार्यक्रम के आयोजक डॉ. पुष्पेंद्र, डॉ. पीएस शुक्ला, डॉ. पीके श्रोत्रिय, डॉ. कामेंद्र सिंह, डॉ. मनोज गुप्ता आदि ने भी विचार व्यक्त किए।