नेपाल सीमा पर भारी मात्रा में पशुओं की तस्करी होती है। इसमें गोवंश के साथ-साथ महिषी वंशी पशुओं की भारी मात्रा में तस्करी होती है। पशुओं की तस्करी में बहुत बड़ा नेटवर्क यहां पर काम करता है। जिसका काम नेपाल के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से दूध न देने वाले पशुओं को खरीद कर सीमा के नजदीक के किसी गांव में एकत्रित करना है। उसके बाद भारतीय सीमा पर लाइन मिलने के बाद पशुओं की पूरी खेप एक साथ यहां भेज दी जाती है। बार्डर पार करने के बाद यहां से यह पशु उत्तर प्रदेश के न्यूरिया होते हुए स्लाटर हाउस में पहुंच जाते हैं।
नेपाल सीमा पर एसएसबी सहित तमाम सुरक्षा एजेंसियां, थाना हाने के बावजूद पशुओं की तस्करी आम बात है। अक्सर एसएसबी द्वारा यहां पशुओं को तस्करों से छुड़ाया जाता है। लेकिन इसके बावजूद तस्करी रुकने का नाम नहीं ले रही है। जबकि पुलिस भी इन तस्करों के विरुद्ध काम करती है। कोतवाली पुलिस ने विगत दो वर्षों में 15 मुकदमे पशु क्रूरता अधिनियम में पंजीकृत किए हैं। नेपाल सीमा में वर्ष 2015 में खुले थाना झनकईया में एक वर्ष में 10 मुकदमे पंजीकृत किए गए हैं। वर्ष 2007 में तत्कालीन कोतवाल केएन आर्य ने तस्करी कर भारत में लाए जा रहे 90 गोवंशी पशुओं को तस्करों से छुड़ाया था। इन दो वर्षों में एसएसबी ने 175 भैंसे कस्टम के सुपुर्द की हैं।
तस्करी का यह आलम है कि मारुति कार 800 जैसे वाहनों में भी गोवंश को बेहोश कर ठूस कर नेपाल सीमा से लाया जाता है। वर्ष 2013 में नेपाल की ओर से मारुति कार में एक बैल को लेकर आ रहे चालक की कार अनियंत्रित होकर वनखंडी के पास पलट गई, जिससे चालक और बैल दोनों की मौत हो गई थी। पशुओं की तस्करी में उत्तर प्रदेश के तस्करों के अलावा स्थानीय लोग भी शामिल हैं। लेकिन पुलिस आज तक उन तक नहीं पहुंच पायी है।