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बारिश से बढ़ती 414 परिवारों की मुश्किलें

Mon, 27 Jun 2016 10:21 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला टिहरी
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घर पर पड़ी दरारें - फोटो : amarujala
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हर बार मानसून आते ही बांध प्रभावित 414 परिवारों की मुश्किलें बढ़ने शुरू हो जाती है। प्रभावितों के पास गुहार लगाने और झील के कारण भूधंसाव से घर, आंगन और खेतों में पड़ी दरारों की डर से घर छोड़ने के सिवा कुछ भी नहीं रह जाता है।
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प्रभावितों के पुनर्वास को करीब साढ़े चार सौ हेक्टेयर भूमि की जरूरत है, लेकिन वर्षों से टीएचडीसी एवं राज्य सरकार प्रभावितों के पुनर्वास के लिए भूमि उपलब्ध नहीं करवा पाई, जिससे पुनर्वास निदेशालय प्रभावितों का पुनर्वास नहीं कर पा रहा है।

भागीरथी और भिलंगना घाटी के झील के आसपास निवासरत 45 गांव के 190 परिवारों का पुनर्वास नीति, 104 का सांपाशविक क्षति नीति (झील का पानी घटने-बढ़ने से हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति) और 120 परिवारों का देखरेख के तहत पुनर्वास होना है। पुनर्वास निदेशालय ने वर्ष 2010 में प्रभावित परिवारों का भू-गर्भीय सर्वे समेत संपूर्ण औपचारिकताएं पूरी कर पात्रता का निर्धारण किया है।
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निदेशालय अधिकांश परिवारों को नकद प्रतिकर भुगतान भी कर चुका है, लेकिन पुनर्वासित करने को मिलने वाले आवासीय एवं कृषि भूखंड आवंटन को भूमि उपलब्ध नहीं होने से भूखंड आवंटित नहीं कर पा रहा है। पुनर्वास को राज्य सरकार ने भूमि प्रस्तावित कर केंद्र सरकार को भेजना है, जिसको स्वीकृति दिलाना टीएचडीसी का काम है। बावजूद राज्य सरकार ने प्रस्ताव केंद्र को भेजा ही नहीं है।

प्रभावित गांव
नंदगांव 47, लुणेटा (भटकंडा) 30, रौलाकोट 105, सिल्ला उप्पू 40, पिपोला खास 18, खांड धारमंडल 15 समेत कैलबागी, गडोली, छोटी नागणी, चांठी, रतवाड़ी, भल्डियाना, बड़कोट, गोजियाणा, बौंर, पिलखी, गोजमेर, तिवाड़गांव, सरोट, पयाल गांव, धर्मघाट, क्यारी।

पुनर्वास को चाहिए 406 हेक्टेयर भूमि
प्रभावित गांव के पुनर्वास के लिए करीब 406 हेक्टेयर भूमि की जरूरत है। वर्तमान में राज्य सरकार ने पशुलोक, आईडीपीएल और दूधू पानी में भूमि का चयन कर दिया है। अब भूमि का ऑनलाइन प्रस्ताव केंद्र सरकार को स्वीकृति के लिए भेेजने की तैयारी में हैं। पुनर्वास नीति के तहत ग्रामीण क्षेत्र में पुनर्वासित होने वाले प्रत्येक परिवार को 10 बीघा कृषि और दो सौ वर्ग मीटर आवासीय भूखंड दिए जाने का प्राविधान है।

बारिश में घर छोड़ देते हैं प्रभावित
नंदगांव, लुणेटा, रौलाकोट आदि गांव के परिवार बारिश के डर के कारण अपने घरों को छोड़ देते हैं। वह सुरक्षित स्थानों पर बसे गांव के अन्य परिवारों एवं टीनशेडों में शरण लेते हैं। बारिश का मौसम समाप्त होने से जीर्णशीर्ण घरों में रहने को मजबूर हो जाते हैं।

प्रभावितों के पुनर्वास को भूमि का चयन कर लिया गया है। करीब 10 दिन के प्रस्ताव को ऑनलाइन कर स्वीकृति के लिए केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। खतरे की जद में आए परिवारों के सुरक्षित स्थान पर वैकल्पिक व्यवस्था के लिए टीनशेड बनाए जाने पर विचार किया जाएगा।
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-इंदुधर बौड़ाई, डीएम व पुनर्वास निदेशक।
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