चंबा टिहरी)। दुनियाभर में वेदांत का प्रचार-प्रसार करने वाले स्वामी रामतीर्थ का कोटी कालोनी स्थित स्मारक अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। समय रहते इस ऐतिहासिक स्मारक का संरक्षण न किया गया, तो यह गुमनामी के अंधेरे में खो जाएगा।
भारत के आध्यात्मिक ज्ञान का अमेरिका, जापान, मिस्र सहित कई देशों में डंका बजाने वाले युवा संन्यासी स्वामी रामतीर्थ को अपनी ही कर्म स्थली टिहरी में तंत्र की उपेक्षा का दंश झेलना पड़ रहा है। 22 अक्तूबर 1873 को गुजरांवाला (अब पाकिस्तान में) के मुरारीवाला ग्राम में तीर्थराम का जन्म हुआ था। गणित का प्रोफेसर बनने के बाद तीर्थराम 1897 को लाहौर से सत्य की खोज में हरिद्वार होते हुए टिहरी पहुंचे। साधना के उच्च सौपान पर पहुंचने पर तीर्थराम संन्यास ग्रहण कर स्वामी रामतीर्थ बन गए और उन्हें मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार का सौभाग्य प्राप्त हुआ। रामतीर्थ महाराज को टिहरी और मां गंगा से बड़ा लगाव था। मगर स्वामी रामतीर्थ की यादों से जुड़ा उनका कोटिकालोनी स्थित स्मारक का संरक्षण और प्रचार-प्रसार न होने से गुमनामी के अंधेरे में खोया हुआ है। एसआरटी (स्वामी रामतीर्थ) आश्रम समिति टिहरी के काका हरिओम, डा. प्रभाकर जोशी का कहना है कि आज के समय में देश को एकता, संगठन, राष्ट्रधर्म और विज्ञान साधना की आवश्यकता है। इसके लिए जरूरी है कि स्वामी रामतीर्थ की स्मृति से जुड़े स्मारक का रख रखाव कर इसे सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षण किया जाए। संस्कृति विभाग के निदेशक बीना भट्ट का हना है कि स्वामी रामतीर्थ के स्मारक संरक्षण संबंधी मामले में डीएम टिहरी से आख्या मांगी गई है। रिपोर्ट के आधार पर स्मारक संरक्षण की कार्रवाई की जाएगी।