चंबा (टिहरी)। इस साल 24 सितंबर से नौ अक्तूबर तक श्राद्धपक्ष रहेगा। शास्त्रों में मान्यता है कि पितृपक्ष के दिनों में हमारे पूर्वज धरती पर सूक्ष्म रूप से आकर परिजनों के पिंडदान और तर्पण को स्वीकार करते हैं। पितृ विसर्जन यानी श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को पूर्वज पृथ्वी से विदा होकर मुक्तिलोक की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। वहीं पितृपक्ष के दौरान सारे शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित रहते हैं।
भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक श्राद्ध पक्ष होता है। मान्यता है कि श्राद्ध पक्ष के दौरान ब्रह्मांड की ऊर्जा के साथ पितरों की आत्मा पृथ्वी पर व्याप्त रहती है। जिस दिन किसी स्त्री या पुरुष की मृत्यु हुई हो, उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। कई बार ऐसा होता है कि हम अपने किसी पूर्वज का श्राद्ध तो करना चाहते हैं, लेकिन हम उनकी मृत्यु की तिथि नहीं जानते। ऐसे में यदि हमें अपने पूर्वज के निधन की तिथि मालूम नहीं हो, तो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है। इस वर्ष अमावस्या आठ अक्तूबर को पूर्वाह्न 11.32 बजे से अगले दिन नौ अक्तूबर सुबह 9.30 बजे तक रहेगी। ऐसे में अमावस्या का श्राद्ध आठ अक्तूबर को दोपहर बाद किया जाना अधिक फलदायी होगा। पितृ विसर्जन नौ अक्तूबर को सुबह 10 बजे बाद किया जाएगा। श्राद्ध पक्ष में गाय, ब्राह्मण, कौआ, कुत्ता और चींटी को भोजन खिलाना उत्तम माना गया है। उत्तराखंड विद्वत सभा के पूर्व अध्यक्ष पं. उदय शंकर भट्ट का कहना है कि भारतीय सनातन संस्कृति में मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता है। मनुष्य को अपने पितृगणों की आत्मा की शांति और अपने कल्याण के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
पितर पक्ष में क्यों हैं शुभ कार्य वर्जित
जिस तरह से घर-परिवार में जब किसी का देहांत हो जाता है, तो शोकाकुल परिवार 13 दिन तक एक भी शुभ कार्य नहीं करता। ठीक उसी तरह से पितृ पक्ष के दौरान भी पितरों को याद करने के लिए सारे अच्छे काम छोड़ देते हैं। ऐसा करके लोग पितरों पर अपना ध्यान लगाते हैं और उन्हें खुश करने की कोशिश करते हैं, जिससे उनका आशीर्वाद उन्हें मिलता रहे।