नरेंद्रनगर (टिहरी)। आपदा से बेघर हुए डौंर गांव के 40 परिवारों को सात साल बाद भी स्थायी ठिकाना नहीं मिल पाया है। शासन-प्रशासन ने प्रति परिवार को ढाई-ढाई लाख रुपये की राहत तो दी है, लेकिन मकान बनाने के लिए अभी तक जमीन नहीं तलाश पाई है। जिससे आपदा का जख्म खाए यह परिवार राजस्व विभाग और पुलिस के जर्जर कमरों में रहने को मजबूर हैं।
सितंबर 2011 की आपदा ने डौर गांव में बड़ी तबाही मचाई थी। मलबे से दबे मकानों में छह लोग जिंदा दफन हो गए थे। जबकि कई आवासीय मकान जर्जर स्थिति में पहुंच गए थे। तब प्रशासन ने प्रभावितों को नरेंद्रनगर में स्थित राजस्व और पुलिस की खाली पड़ी कालोनियों में शिफ्ट किया था। सात साल बीतने पर भी वह आपदा प्रभावित जर्जर हो चुके कमरों में रहने को मजबूर हैं। आपदा प्रभावित ललिता प्रसाद, गोवर्द्धन, रोशन लाल, रामा, मंगल सिंह चौहान और राम सिंह ने बताया कि सरकारी भवन जर्जर स्थिति में पहुंच गए हैं। विभाग भी कई बार आवास खाली करने का नोटिस देकर डराते रहते हैं। कई परिवार खेती-बाड़ी पर ही निर्भर थे, लेकिन अभी तक आवासीय भूखंड मिला ना ही कृषि भूमि।
आपदा प्रभावितों के पुनर्वास की प्रक्रिया चल रही है। प्रदेश में कई परिवारों को जमीन आवंटित की जानी है। जमीन को लेकर भी कई अड़चने आ रही है। सरकार आपदा प्रभावितों को बसाने का प्रयासरत है।
-सुबोध उनियाल, कृषि मंत्री।
डौर गांव के आपदा प्रभावितों के लिए जमीन तलाशने की कार्रवाई चल रही है। कई जगह उन्होंने रिजेक्ट की है, जमीन मिलते ही आवंटन की कार्रवाई शुरू की जाएगी।
-सोनिका, डीएम टिहरी।