चंबा (टिहरी)। शंकराचार्य माधवाश्रम महाराज का पहाड़ और टिहरी से भी गहरा प्रेम था। 1993 में शंकराचार्य बनते ही टिहरी में कई बार देशभर के संतों को एकत्रित कर गाय, गंगा और सनातन धर्म संरक्षण को लेकर कई बार सम्मेलन करवाए। शंकराचार्य के शुक्रवार को ब्रह्मलीन होने पर टिहरी में गरीबों के लिए मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए अस्पताल का सपना भी अधूरा ही रह गया।
शंकराचार्य माधवाश्रम ने चंडीगढ़ में सुबह 9.10 बजे आखिरी सांस ली। शंकराचार्य बनते ही माधवाश्रम ने सबसे पहले गाय की दुर्दशा को सुधारने के लिए आंदोलन किया। इसके अलावा गंगा में बड़े बांधों के भी वे विरोधी रहे हैं। इसके लिए उन्होंने कई बार दिल्ली सहित अनेक स्थानों में धरना भी दिया। जगद्गुरु गंगा की अविरलता और निर्मलता को लेकर चिंतित रहते थे। बदरीनाथ में जब 2001 में जैन मंदिर बनने की तैयारी की जा रही थी, तो उन्होंने संतों के साथ मिलकर जैन मंदिर नहीं बनने दिया। माधवाश्रम की हार्दिक इच्छा थी कि वे रुद्रप्रयाग की तरह टिहरी में भी गरीब लोगों के लिए अस्पताल और स्कूल खोलेंगे, लेकिन अचानक उनके चले जाने से सनातन धर्मावलंबियों में शोक की लहर है। महाराज का 14 फरवरी 2014 में ब्रेन हेमरेज हुआ था। इसके बाद से महाराज चंडीगढ़ स्थित पीजीआई अस्पताल में स्वास्थ्य उपचार ले रहे थे।