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गांव की नदी की तैराक, एक दिन में बनी 'नेशनल खिलाड़ी'

Mon, 30 Sep 2013 05:40 PM IST
प्रकाश नैनवाल/अमर उजाला, कालाढूंगी
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हमने बहुत से खिलाड़ियों का परिचय आपसे कराया है, लेकिन आज आने वाले समय में खेल जगत में मिसाल बनने जा रही 15 साल की उस खिलाड़ी से आपको मिलाएंगे जिसने सिर्फ एक दिन में खुद को नेशनल खिलाड़ी बनाया तैराकी में।
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दीपा बिष्ट ये नाम उस गरीब घर की बेटी का है जिसका बचपन बौर नदी के साथ बीता है और बौर ने ही उसे आज इस लायक बनाया कि दीपा पहली बार तैराकी देखने हल्द्वानी गई, लेकिन जब लौटी तो राष्ट्रीय स्तर की तैराकी में चयनित खिलाड़ियों में उसका नाम था।

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नेशनल खेल में छलांग
इसे महज एक संयोग समझिये या फिर हुनर की ताकत, लेकिन उत्तराखंड की बेटी बौर नदी के बाद सीधा नेशनल खेल में छलांग लगाने जा रही है। कालाढूंगी से कोटाबाग वाली रोड में पांच किलोमीटर अंदर जाने पर मूसाबंगर आता है।
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यहीं सड़क के किनारे एक कमरा (12 गुणा 12 का) है, जिसमें आधे में जानवर बंधे रहते हैं और आधे में रहता है दीपा के पिता श्याम सिंह बिष्ट का 7 सदस्यीय परिवार। सांस लेने को जगह नहीं बनती, लेकिन पिता की मुफलिसी के चलते परिवार को जीना पड़ता है।

गरीबखाने में पली है दीपा
वहीं एक किनारे मां भगवती बिष्ट का चूल्हा है। इसी छोटे गरीबखाने में पली है दीपा। पिता कृषि करते हैं। पास ही में बहने वाली बौर नदी दीपा की साथी है। इसी नदी की लहरों ने उसे जीवन में आने वाली लहरों (विपदाओं) को जीतकर गरीबी को हराना सिखाया और 20 सितंबर को आई परीक्षा की पहली घड़ी।

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कक्षा 11 में पढ़ने वाली दीपा को उसके स्कूल राजकीय इंटर कालेज बजूनिया हल्दू की व्यायाम शिक्षक किरन बनौली तैराकी दिखाने हल्द्वानी लेकर आई। यहां उस दिन जिला स्तर की तैराकी थी। तैराकी में आए बाकी खिलाड़ियों की तरह दीपा ने प्रशिक्षण नहीं लिया था।

बौर नदी की है तैराक
वो तो बस बौर नदी में ही तैरती थी, मगर दीपा को उसकी शिक्षक ने हौसला देकर उसका जिला स्तर पर पंजीकरण कराया। 500 मीटर ब्रेस्ट स्ट्रोक में अपने भविष्य की पहली छलांग लगा दीपा जिले से राज्य में पहुंच गई।

उसी के अगले दिन यानी 21 सितंबर को हुई राज्य स्तरीय तैराकी में भी उसने पानी को पीछे छोड़ते हुए राष्ट्रीय स्तर के लिए नाम दर्ज कराया। पुणे में नवंबर में राष्ट्रीय तैराकी होनी है। दीपा को जाना है, लेकिन मन उसे गरीबी के खयाल से डरा रहा है। क्योंकि पिता के पास इतना पैसा नहीं कि उसे पुणे भेज सकें। दीपा फिर भी उस चोटी को देखकर खुश है जहां से उसे मुकाम मिलने वाला है।

चुनी गई बेस्ट तैराक
शिक्षा विभाग की इस तैराकी प्रतियोगिता में बेस्ट तैराक रही इस बेटी ने एक स्वर्ण एक रजत पदक जीता है। वो एक अच्छी धावक भी है। उम्र छोटी होने के बावजूद दीपा के इरादे विराट हैं। वो तैयारी कर रही है नेशनल खेलने के लिए। उसे बस इतना पता है कि किसी भी तरह पुणे पहुंच जाऊं तो जीतकर लौटूंगी।

आने वाले समय में अपने परिवार से गरीबी हटा सकूंगी अपनी लगन की बदौलत। एक बड़े और तीन छोटे भाइयों की चिंता भी है उसे । बहरहाल अब इस बेटी को ऊर्जा से भरी हुई शुभकामनाएं चाहिए जो उसका मनोबल बढ़ा सके। कुछ मदद चाहिए जो उसके सपनों की दुनिया सच बनाने में उसका साथ दे सके। ताकि एक दिन में नेशनल तैराक बनने वाली खेल की मिसाल बन जाए।
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