‘वही घर में ड्राइवरी करके अके ले कमाता था... 16 जून को बेटे का फोन आया था कि केदारनाथ में बादल फटा है...अब पता नहीं फोन क्यों बंद किता सी...।’
इतना कहते-कहते वडाला, अमृतसर, पंजाब से अपने बेटे, बहू और नाती को ढूंढने पहुंचे 80 वर्षीय भगवंत सिंह की आंखें छलछला उठी। वह रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बेटे के इंतजार में हाथ जोड़े बैठे हैं।
अभी भूला नहीं है तबाही का मंजर
उत्तराखंड में आपदा से मची भीषण तबाही की मार का असर देशभर में कितना गहरा हुआ है, यह अपने पूरे परिमाण के साथ दिखने लगा है। देशभर से लोग परिचितों को ढूंढने के लिए देहरादून रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हैं, लेकिन लचर प्रशासनिक कार्यप्रणाली बजाय जख्मों पर मरहम लगाने के नमक छिड़क रही है।
उत्तराखंड आपदा की विशेष कवरेज
रविवार को सुबह अमृतसर से भगवंत सिंह अपने छोटे बेट हरविंदर सिंह के साथ रेलवे स्टेशन पर पहुंचे तो आपदा में बचे लोगों की लिस्ट देखकर मायूस हो गए। उन्होंने बताया कि उनका बेटा बलविंदर सिंह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ हेमकुंड साहिब के दर्शन करने के बाद केदारनाथ घूमने गया था। भगवंत सिंह ने आपदा राहत केंद्र के नंबरों पर भी फोन लगाया लेकिन किसी ने भी सही जानकारी देने के बजाय फोन आगे बढ़ा दिया।
सभी लोग केदारनाथ में ही थे
किसान भगवंत रेलवे स्टेशन पर ही वेटिंग रूम में बैठ गए हैं। जितेंद्र शर्मा भी रेलवे स्टेशन पर अपनी भाभी और भतीजी को ढूंढने के लिए आए। जितेंद्र का भाई सौरभ तो मिल गया लेकिन भाभी रश्मि और 11 साल की भतीजी आस्था गुम है। हादसे वाली रात सभी लोग केदारनाथ में ही थे।
कमोबेश ऐसी ही स्थिति अपने उदयपुर से अपने मां-बाप और भाई को ढूंढने पहुंचे 26 वर्षीय सौरभ गुप्ता की भी है। सौरभ के पिताजी सुधीर गुप्ता, मां मिथलेश और 12 साल का भाई सुयश रामबाड़ा से गायब हैं। सौरभ अपने मां-बाप की फोटो को आपदा राहत केंद्र में देते हुए कांप गया।
आखिरी दफा हुई बात
उसने बताया कि 15 जून की रात रामबाड़ा में उसकी अपने मां-पिताजी से आखिरी दफा बात हुई थी। सौरभ, भगवंत और जितेंद्र जैसे ही कई और लोग देश के कोनों-कोनों से उम्मीद लिए अपनों को ढूंढने बदहवासी में रेलवे स्टेशनों पर घूम रहे हैं, लेकिन प्रशासन की बदइंतजामी उन्हें और मायूस कर दे रही है।