स्वास्थ्य विभाग होने वाले करोड़ों के घपलों घोटालों की जांच पर जांच होती है, लेकिन कार्रवाई नहीं होती। मुख्य चिकित्साधिकारी कार्यालय में जिला योजना की खरीद में हुए घोटाले की एक जांच रिपोर्ट आने के बाद दोबारा से नई जांच बैठा दी गई। प्रमुख सचिव स्वास्थ्य के निर्देश पर अपर सचिव स्वास्थ्य को मामले की जांच सौंपी गई है, जबकि स्वास्थ्य महानिदेशालय इससे पहले मामले की जांच कर चुका है।
वर्ष 2014 से फर्जी वाहन बिल घोटाले की तीन बार जांच हो चुकी है, लेकिन एक बार फिर अपर सचिव रैंक के अधिकारी को जांच सौंपी गई है। वर्ष 2009 के एक्सपायर दवा घोटाला में चार बार हुई जांच के बाद दोषी तो चिन्हित हुए लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।
जांच पर कार्यवाही के बजाए फिर नए सिरे से जांच का ताजा प्रकरण सीएमओ कार्यालय में जिला योजना के करीब दो करोड़ रुपए की खरीद में बड़े स्तर पर अनियमितता के मामले का है। इस मामले की जांच में घोटाले की पुष्टि हुई थी। स्वास्थ्य महानिदेशालय के कुछ अधिकारियों की भूमिका भी इस मामले में संदिग्ध पाई गई थी।
जांच रिपोर्ट में घोटाले की पुष्टि होने के बाद भी किसी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति तक नहीं हुई। डा. आरपी भट्ट के स्वास्थ्य महानिदेशक रहने के दौरान यह रिपोर्ट बाहर नहीं निकल पाई थी। बाद में महानिदेशालय स्तर से यह रिपोर्ट शासन को भेजी गई।