इक्कीसवी सदी में भी पहाड़ पर सड़कें न बनने पर साहिया रहने वाले लोगों की जिंदगी भी पहाड़ सी बन गई है। लोगों के लिए सड़क अब सपना बनकर रह गई है।
सड़क न होने से यहां की शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। यहां तक कि सड़कों के अभाव में रिश्तेदारों ने भी यहां आना कम कर दिया है। सड़क न बनने का मुख्य कारण लोक निर्माण विभाग की काहिली और वन विभाग की एनओसी न मिलना है।
सड़क न होने से लोगों की जिंदगी ऐसे में इन गांव में जिंदगी चल तो रही है लेकिन धीमी रफ्तार से। गांव तक सिलेंडर पहुंचाना हो या फिर फसलों को मंडियों तक। सब काम पैदल और खच्चरों के सहारे करना पड़ता है। तारली गांव के नारायण सिंह का कहना है कि सड़क न होने से पहाड़ की जिंदगी पहाड़ ही बनी हुई है।
मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाना हो तो पसीने छूट जाते हैं। दूसरे गांव में पढ़ने जाने को बच्चे सुबह जल्दी निकलते है। गांव में रिश्तेदार भी आने से पहले दस बार सोचते हैं। गजेंद्र सिंह, सरदार सिंह, श्याम सिंह का कहना है कि सरकारी सिस्टम की काहिली के चलते अब तक सड़क नहीं पहुंच सकी है। गांव तक सड़क पहुंचाने में विभागीय अधिकारी दिलचस्पी नहीं लेते। एसी कमरों में बैठने वालों को गांव की पीड़ा नजर नहीं आती।
यहां नहीं पहुंची सड़क
बनसार, दधऊ, बिनऊ, बंतऊ, मसराड़, सराड़ी, दोहा, झुसऊ, धिरोग, ठुरऊ, हमराया, पिनगिरी, बड़ेथ, सुनऊ, गड़ोल, सकरोल, कामला, क्यारी, गास्की, सुनऊ, मैसासा, ऊभऊ, तारली, सिला मरलऊ आज भी सड़क सपने से कम नहीं है।
2500 की आबादी पर बनती है सड़क
यदि किसी गांव की आबादी 2500 के पार है तो वहां पर प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत सड़क पहुंचाए जाने का प्रावधान है। लेकिन कालसी प्रखंड के कई गांव ऐसे जहां आज भी संबंधित महकमे से जुड़ा कोई भी अधिकारी सर्वे तक के लिए नहीं पहुंचा है।
कुछ सड़के ऐसी हैं जहां वन विभाग की एनओसी का रोड़ा अटकने से काम अटका हुआ है। शेष सड़कों के लिए बजट नहीं मिल सका है। गांव तक सड़क पहुंचाने के मामले में विभाग गंभीर है। इसके लिए आला अधिकारियों से वार्ता की जा रही है।
- मुकेश परमार, ईई लोनिवि साहिया