वर्ष 1880 से अभी तक उत्तराखंड समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं का दंश झेलता आ रहा है। हजारों की संख्या में जनहानि के साथ अरबों की संपदा तबाह होने के बाद भी मजबूत सुरक्षा तंत्र नहीं बन पाया है। भले ही ये सभी प्राकृतिक आपदाएं थीं। बावजूद सबक नहीं लिया गया, जिस कारण आज भी कई गांव खतरे की जद में हैं।
वर्ष 1881 में नैनीताल में भारी भूस्खलन से 151 लोगों की मौत हो गई थी। साथ ही हजारों नाली भूमि तबाह हो गई थी। इसके बाद वर्ष 1951 में सतपुली नयार में बाढ़ से लेकर वर्ष 1979 में मंदाकिनी घाटी के कोंथा गांव में भूस्खलन में भी कई लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद जून 2013 की केदारनाथ आपदा को सदी की सबसे बड़ी आपदा बताया गया। केदारनाथ से लेकर रामबाड़ा तक ही 7 किमी के दायरे में हजारों लोग काल के ग्रास बन गए थे। तबाही के निशान आज भी मौजूद हैं। केदारनाथ व मंदाकिनी घाटी में वर्ष 1976 से 2013 तक यहां 13 बड़ी प्राकृतिक आपदाएं आ चुकी हैं, जिसमें हजारों की संख्या में मानव व मवेशी काल का ग्रास बन गए। साथ ही केदारनाथ से लेकर कई गांवों का इतिहास व भूगोल पलभर में बदल गया। वर्ष 1998 में ऊखीमठ विकासखंड के मनसूना क्षेत्र में प्राकृतिक आपदा से 103 और वर्ष 2001 और 2012 में ऊखीमठ आपदा में 92 लोगों की मौत हो गई थी। लेकिन आज तक इन गांवों व क्षेत्रों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाए हैं। केदारनाथ आपदा के आठ वर्ष बाद भी प्रदेश व केंद्र सरकारें धाम के पुनर्निर्माण से बाहर नहीं निकल पाई हैं। जिस कारण प्रभावित गांवों में हालात आज भी नाजुक है। केदारनाथ से कुंड तक मंदाकिनी नदी पूरे ढलान पर बहती है, जिससे बरसात में वेग बहुत अधिक रहता है, लेकिन यहां सुरक्षा कार्य के नाम पर एक नया पत्थर नहीं लगा है। स्थिति यह हैं कि आपदा से प्रभावित जिन गांवों को विस्थापन के लिए चिहिृृत किया गया था, वे आज भी बरसात के सीजन में रतजगा होने को मजबूर हैं। जिला मुख्यालयों में गठित आपदा प्रबंधन तंत्र को स्वयं राहत व बचाव की जरूरत है। बावजूद सरकारें सुध लेने के लिए तैयार नहीं हैं।