जिले मेें कई स्थानों पर जंगलों में आंवले के पेड़ मौजूद हैं। इनसे प्रतिवर्ष काफी मात्रा में फल मिलते हैं। इसका उपयोग सीमित होने से फल यूं ही बर्बाद हो जाते हैं। ऐसे में उद्यान विभाग काश्तकारों को आंवले की खेती के लिए प्रेरित कर रहा है। नरेंद्र-9 और चकया नस्ल के साथ स्थानीय नस्ल की पौध का रोपण कर आंवले का बेहतर उत्पादन कर आर्थिकी को मजबूत करने पर जोर दिया जा रहा है।
अगस्त्यमुनि और जखोली में आंवला उत्पादन के लिए बेहतर जलवायु है। आंवला उष्ण जलवायु का वृक्ष है। हालांकि इसे उपोष्ण और मृदु शीतोष्ण जलवायु में भी उगाया जा सकता है। इस पर लू और पाले से जहां कम नुकसान होता है, वहीं बंदर भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। इसे देखते हुए उद्यान विभाग की योजना है कि जो काश्तकार जिन खेतों में खेती नहीं कर रहे हैं या जहां खेती से कम लाभ मिल रहा है, वहां आंवले के पौधे लगाकर इसे आर्थिकी का जरिया बनाएं। इसके लिए विभाग की ओर से नि:शुल्क पौध उपलब्ध कराई जाएगी।
तीन वर्ष में फल देने लगता आंवला
रुद्रप्रयाग। पौधारोपण के तीन वर्ष बाद आंवला का पेड़ फल देने लगता है। एक हेक्टेअर भूमि में एक वर्ष में करीब 60 कुंतल फल मिलते हैं। वर्तमान में जिले में 8 हेक्टयेर भूमि पर 4 मीट्रिक टन आंवले का उत्पादन हुआ है। बाजार में आंवले की कीमत 30 से 40 रुपये प्रति किलो है। ऐसे में एक काश्तकार एक वर्ष में कम से कम दो लाख रुपये की आमदनी कर सकता है।
स्वास्थ्य के लिए लाभदायक आंवला
रुद्रप्रयाग। आंवले में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में होती है। इसके सेवन से वात, पित्त और कफ की समस्या दूर होती है। अचार, मुरब्बा, जैम, जैली बनाकर भी आंवले का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। घरों में सिर धोने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है।
जिले के मौसम और बढ़ते मार्केट को देखते हुए काश्तकारों को आंवले की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। उत्पादन से लेकर बाजार उपलब्ध कराने में विभाग मदद करेगा। - जीएल मखन्वाल, जिला उद्यान अधिकारी रुद्रप्रयाग