अष्टमी की अर्धरात्रि को विशेष पूजा-अर्चना का विधान, नवमी को लगता है मेला
गुप्तकाशी। जनपद की केदारघाटी क्षेत्र में स्थित कालीमठ धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। मां काली को समर्पित यह प्राचीन सिद्धपीठ देशभर के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। शारदीय नवरात्र में यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है और मां के दर्शन के लिए दूरदराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
आचार्य सुरेशानंद गौड ने बताया कि कालीमठ में मां काली ने रक्तबीज नामक राक्षस का संहार किया था। यहां मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती की विशेष महत्ता है। यहां मां काली की प्रतिमा के बजाय भूमिगत कुंड की पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर की धार्मिक परंपराओं के अनुसार, अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में मंदिर के गर्भगृह स्थिति कुंड जो चांदी की प्लेट से ढका रहता है वो खोला जाता है और इसकी विशेष पूजा का विधान है।
नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इस अवसर पर स्थानीय लोगों की भागीदारी भी बढ़ जाती है। कालीमठ क्षेत्र की धार्मिक परंपराएं और मान्यताएं इसे केदारघाटी के प्रमुख तीर्थस्थलों में विशिष्ट स्थान दिलाती हैं। काली मठ ग्राम प्रधान प्रदीप राणा बताते हैं कि काली मठ मंदिर जहां बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अधीन है वहीं कालीमठ कविल्ठा देशवाल ह्यूण शेरसी तथा व्यूखी यहां के हक-हकूकधारी हैं ।