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द्वितीय केदार मद्महेश्वर धाम के कपाट खुले

Fri, 20 May 2016 09:16 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रुद्रप्रयाग
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द्वितीय केदार भगवान मद्महेश्वर की डोली धाम को प्रस्थान करती हुई। - फोटो : Amar Ujala
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द्वितीय केदार भगवान मद्महेश्वर के कपाट शुक्रवार को विधि-विधान व पूजा अर्चना के साथ प्रात: साढ़े ग्यारह बजे आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं। छह माह तक भगवान मद्महेश्वर की पूजा धाम में ही होगी।
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मद्महेश्वर धाम में पुजारी गंगाधर लिंग ने मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश कर पूजा अर्चना की। इसके बाद भगवान का श्रृंगार कर अभिषेक किया गया। इस दौरान मंदिर के हक हकूकधारी एवं रांसी एवं गौंडार के ग्रामीणों द्वारा भगवान की डोली और यात्रियों का स्वागत किया।

इससे पूर्व प्रात: 6 बजे गौंडार गांव में ग्रामीणों ने भगवान की पूजा कर उन्हें बणतोली तक विदा किया। इसके बाद बणतोली बणतोली, खडराखाल, नानू आदि स्थानों पर भक्तों ने अपने आराध्य की पूजा कर भेंट अर्पित की।
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जयकारों से गूंजा माहौल
बणतोली, खडराखाल, नानू आदि स्थानों से होते हुए डोली 10.30 बजे देव दर्शनी पहुंची। यहां पर भगवान ने करीब एक घंटे तक विश्राम किया। 11.15 बजे मद्महेश्वर धाम से आगमन का निमंत्रण मिलने पर डोली धाम को रवाना हुई और मंदिर पहुंची।

मंदिर की दो परिक्रमा करने के बाद भगवान मद्महेश्वर ने भक्तों को आशीष दिया। इस मौके पर पूरा क्षेत्र भगवान मद्महेश्वर के जयकारों से गूंज उठा। उसके बाद मंदिर मुख्य द्वार पर विराजमान हुई। यहां पर मुख्य पुजारी एवं मंदिर के हक हकूकधारियों द्वारा भगवान की डोली को गर्भ गृह में विराजमान किया गया। इस मौके पर दिनेश बगवाडी, गंगाधर सेमवाल, गौंडार के पूर्व प्रधान आलम सिंह समेत कई जनप्रतिनिधि मौजूद थे।

भगवान ने किया अपने पात्रों का निरीक्षण
धाम पहुंचने पर भगवान भगवान मद्महेश्वर ने मंदिर परिसर में रखे अपने ताम्र पात्रों का बारी-बारी से निरीक्षण किया। परिसर में छोटे घड़े से लेकर कई बड़े बर्तन थे। मान्यता है कि छह माह तक धाम में इन पात्रों का उपयोग किया जाता है। जब भगवान के कपाट बंद होते है तो ये पात्र मंदिर के निकट बने धर्मशाला में रखे जाते हैं।

चालीस फीसदी बंगाली श्रद्धालु पहुंचे
मद्महेश्वर। पश्चिम बंगाल के विभिन्न शहरों से भगवान मद्महेश्वर के दर्शनों के लिए करीब 25 फीसदी श्रद्धालु इनमें अधिकांश अपने परिवार के साथ आए हुए थे। इसके अलावा रांसी गौंडार समेत रुद्रप्रयाग, पौड़ी और टिहरी समेत अन्य स्थानों से भी लोग धाम में पहुंचे हुए थे।
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