ऐसा पहली बार होगा कि बाबा की डोली शीतकालीन गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ से सीधे गौरीकुंड पहुंचेगी। न भक्तों जयकारा होगा और न ही सेना बैंड की धुन। पैदल मार्ग भी आस्था के उल्लास से सूने रहेंगे। बीते 60 वर्ष से केदारनाथ यात्रा में शामिल होते आ रहे वयोवृद्ध तीर्थ पुरोहित श्रीनिवास पोस्ती बताते हैं, यात्रा के इतिहास में पहली बार होगा, जब मेरू-सुमेरू पर्वत की तलहटी में बसे केदारनाथ मंदिर के कपाटोद्घाटन पर भक्त भी नहीं होंगे।
‘मन व्याकुल है कि डोली संग धाम नहीं जा पा रहा’
इस बार केदारनाथ मंदिर के कपाटोद्घाटन पर भक्त नहीं शामिल होंगे। केदार सभा के अध्यक्ष विनोद शुक्ला कहते हैं, मन व्याकुल है कि बाबा की डोली के साथ धाम नहीं जा पा हूं। उन्हें उम्मीद है कि जल्द ही यह विपदा दूर हो जाएगी और बाबा अपने भक्तों को स्वयं बुलाएंगे। बीते 35 वर्ष से केदारनाथ के कपाटोद्घाटन में शामिल हो चुके शिक्षक केपी सेमवाल का कहना है, कोरोना ने भक्त और भगवान के मिलन को कुछ देर के लिए जरूर रोका है। लेकिन जल्द मिलन होगा।
तब भी, भक्त नहीं हो पाए थे शामिल
रुद्रप्रयाग। आज से सात साल पहले 2013 की केदारनाथ आपदा में व्यापक तबाही के बाद धाम में यात्रा का संचालन कुछ समय के लिए रोक दिया गया था। तीर्थ पुरोहितों से मंत्रणा के बाद धाम के कपाट उस साल 11 सितंबर को खोले गए थे। लेकिन, उस तिथि पर सिर्फ राज्य सरकार के प्रतिनिधि, तीर्थ पुरोहित और मंदिर समिति के कुछ कर्मचारी ही मौजूद थे।