उत्तराखंड का एक गांव ऐसा भी है, जहां बच्चे जन्म नहीं लेते। माताएं बच्चों को जन्म देने के लिए कुछ महीने पहले गांव को छोड़ देती हैं।
मद्महेश्वर घाटी के अंतिम गांव गौंडार में ऐसा किसी अंधविश्वास से नहीं बल्कि मजबूरी है। कारण गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा नसीब नहीं हो पाई है। ऐसे में ग्रामीण जच्चा-बच्चा की सेहत को देखते हुए 21वीं सदी में भी ऐसा करने के लिए मजबूर है।
रुद्रप्रयाग से 76 किमी दूर गौंडार गांव को अलग राज्य बनने के बाद भी जरूरी सुविधाएं नहीं मिल सकी। बुखार की एक गोली के लिए भी ग्रामीणों को घने जंगल से गुजरते हुए छह किमी का पैदल रास्ता नाप कर रांसी पहुंचना होता है। फिर वहां से 28 किमी सड़क मार्ग से ऊखीमठ पहुंचना होता है। इन हालात में गांव में सुरक्षित प्रसव की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यही वजह है कि ग्रामीण अपनी बहुओं को बच्चा जनने के लिए डेढ़ से दो माह पहले मायके या रिश्तेदारी में भेज देते हैं।
ग्रामीणों की मानें तो गांव में छह वर्षों में 20 बच्चे पैदा हुए। इनमें 18 बच्चे अपने नाना या रिश्तेदार के घर में जन्में। जबकि एक बेस अस्पताल श्रीनगर व एक जिला अस्पताल रुद्रप्रयाग में पैदा हुआ। ये दोनों भी मायके गई हुई थीं।
वयोवृद्ध त्रिलोक सिंह और फतेह सिंह पंवार बताते हैं, जिन बहुओं के मायके रांसी, राउलेंक, मनसूना, ऊखीमठ सहित सड़क से लगे गांव हैं उन्हें प्रसव के लिए एक माह पहले मायके भेज दिया जाता है। जिनके मायके दूर हैं, उन्हें ससुराल पक्ष सड़क से लगे गांवों में अपनी रिश्तेदारी में भेजते हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिनके मायके या रिश्तेदार बहुत दूर है या सक्षम नहीं है। वे मजबूरी में घरों में रहते हैं। प्रसव पीड़ा के शुरू होते ही ग्रामीण डंडी के सहारे रांसी लाते हैं और फिर वहां से ऊखीमठ या रुद्रप्रयाग अस्पताल पहुंचाते हैं। ग्रामीण रमेश पंवार व भूपेंद्र पंवार कहते हैं यह गांव की नियति बनकर रह गई है। पता नहीं, गांव के लोग कब अपने पोते-पोतियों की किलकारी अपने घर में सुनेंगे। जिला बदला हो चाहे नया राज्य उत्तराखंड बना हो, गौंडार की सुध किसी ने नहीं ली।
कोट-
गौंडार गांव में वैकल्पिक सुविधा तौर पर फार्मासिस्ट की तैनाती जल्द की जाएगी। स्वास्थ्य विभाग को निर्देशित कर दिया गया है। इसके अलावा गांव में विभाग सहित अन्य संस्थाएं समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर लगाने को लेकर भी रूपरेखा तैयार की जा रही है।- डा. राघव लंगर, डीएम रुद्रप्रयाग