पार्वती कहती हैं कि संघर्ष का यह जज्बा उन्हें अपने जीवन के संघर्षों और तल्ख अनुभवों से मिला है। वह बताती हैं कि उनका जन्म अल्हा-उदल की जन्मस्थली महोबा जिले (यूपी) के कुल पहाड़ गांव में हुआ था। माता-पिता मजदूरी करते थे।
घर पर कोई मौजूद न होने के कारण माता-पिता उनको अपने साथ ही ले जाते थे। जब माता-पिता मजदूरी कर रहे होते थे, तब वह रेत, बजरी और ईंटों के बीच बैठी रहती थीं। गरीबी के कारण 10वीं कक्षा उत्तीर्ण करते ही उनका बांदा जिले (यूपी) में विवाह हो गया था।
उस समय समाज में महिलाओं के लिए पर्दा प्रथा बहुत प्रचलित थी। बेटियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना चुनौती था लेकिन माता-पिता, पति और सास-ससुर का सहयोग मिलने से उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने विवाह के बाद महोबा से इंटरमीडिएट, बांदा जिले से बीए, एमए, बीएड और बीटीसी किया। घर का खर्च चलाने के लिए कपड़े भी सिले।
लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 1991 उनकी प्रवक्ता के पद तैनाती हुई। उनकी पहली पहली तैनाती जीजीआईसी गंगोलीहाट (पिथौरागढ़) में हुई। वहां वह 15 वर्ष तैनात रहीं। उसके बाद उच्चर कन्या प्राथमिक विद्यालय बागेश्वर में प्रधानाध्यापक बनीं। इसके बाद वह रुद्रपुर जीजीआईसी की प्रधानाचार्य बनीं।