रुद्रपुर। तराई में लगातार गिर रहे भूजल स्तर के बावजूद बेमौसमी धान की खेती धड़ल्ले से ही रही है। ऊधमसिंह नगर में बेमौसमी धान की खेती पर प्रतिबंध लगाने को लेकर कृषि विभाग और शासन दोनों का ही रैवया ढुलमुल है। यही वजह है कि करीब पांच माह पहले ऊधमसिंह नगर से भेजा गया प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया है। उत्तराखंड के प्रमुख उत्पादक जिला ऊधमसिंह नगर में बेमौसमी धान के नकारात्मक परिणाम सामने आने पर कृषि विभाग व प्रशासन की ओर से शासन को प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन शासन से इसका जवाब न मिलने पर कृषि विभाग के अधिकारियों ने इसकी वजह जानने का प्रयास नहीं किया। जिले में अब बेमौसमी धान की खेती दोबारा शुरू हो गई है। रुद्रपुर के भूरारानी, बगवाड़ा, भगवानपुर, गंगापुर रोड, मलसी, मलसा, दानपुर समेत विभिन्न गावों में लोग बेमौसमी धान लगा रहे हैं। जबकि जिले में बेमौसमी धान के नकारात्मक परिणाम सामने आ चुके हैं। अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में तराई में खरीफ की प्रमुख फसल धान की साल में दो बार खेती की जा रही है। धान की खेती में पानी के अत्याधिक दोहन के कारण पिछले सात आठ सालों में तराई का भूजल स्तर करीब 70 फीट नीचे चला गया है। धान की दो फसलों के बीच अंतराल न होने से कीटों का जीवन चक्र टूट नहीं पा रहा है। इससे कीटों व रोगों की संख्या बढ़ रही है। जिस कारण अत्याधिक कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है। कीटनाशकों का अत्याधिक प्रयोग से धान की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। इसका दुस्प्रभाव कहीं न कहीं मानव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। जिले में कृषि विभाग के अधिकारी भी प्रस्ताव के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं दे रहे हैं। इस संबंध में कुमाऊं आयुक्त कृषि विभाग डॉ. पीके सिंह कहते हैं कि ऊधम सिंह नगर जिले में बेमौसमी धान पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन अभी शासनादेश जारी नहीं हुआ है।