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दुर्योधन वध के साथ ही पांडव लीला का हुआ समापन

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ऊखीमठ। पंचकेदार गद्दी स्थल ओंकारेश्वर मंदिर में आयोजित पांडव नृत्य में दुर्योधन वध का आयोजन किया गया। इसी के पांडव नृत्य के आखिरी दिन समिति द्वारा कला, शिक्षा, लोक गायन सहित विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले 120 लोगों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
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ओंकारेश्वर मंदिर में एक माह तक चले पांडव नृत्य में मंगलवार को जीआईसी के समीप सेरा तोक में हाथी कौथिग का मंचन किया गया। जब महाभारत युद्ध के पश्चात शेष बचे कृपाचार्य, कृतवर्मा एवं अस्वस्थामा रणक्षेत्र से अलग हो जाते है। अंत में बचा दुर्योधन हताश होकर अपनी पत्नी भानुमति, माता गांधारी एवं पिता धृतराष्ट से बचने का उपाय पूछता है। जिस पर माता गांधारी दुर्योधन से गंगा स्नान के पश्चात नग्न अवस्था में उनके सम्मुख आने के लिए कहती है। दुर्योधन ऐसा ही करता है, लेकिन रास्ते में भगवान श्रीकृष्ण उसे मिलते है, और दुर्योधन से कहते है कि नग्न अवस्था में तुम अपने मां के पास कैसे जाओगे। दुर्योधन अपनी जंघाओं को केले के पत्तों से ढकने के बाद अपनी माता के सम्मुख खड़ा हो जाता है। माता गांधारी की नजर जब दुर्योधन पर पड़ती है तो जंघाओं को छोड़कर उसका सारा शरीर बज्र का हो जाता है। इसके बाद वह भीम युद्ध करता है। श्रीकृष्ण का इशारा पाकर भीम दुर्योधन की जंघाओं पर प्रहार कर उसे मार डालता है। दुर्योधन वध का मंचन मंदिर परिसर स्थित पांडव नृत्य स्थल पर किया गया। हाथी कौथिग के संचालन में जैक्सवीन नेशनल पब्लिक स्कूल के प्रबंधन लखपत सिंह राणा, कविता भट्ट, मुकेश नेगी, नवीन मैठाणी, एवं भूपेंद्र राणा ने अहम भूमिका निभाई। इसके पश्चात पांडव पश्वा एक दूसरे के गले लगकर भावुक हो गए। जबकि नृत्य स्थल पर मौजूद भक्तों की भी आंखें भर आई। समापन के बाद पांडवों के अस्त्र शस्त्र ओंकोरेश्वर मंदिर स्थित बाराही मंदिर में स्थापित किया गया। इस मौके पर भारी संख्या में लोग मौजूद थे।
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