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पर्यावरण संरक्षण को कोट तल्ला गांव की अभिनव पहल

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रुद्रप्रयाग। रानीगढ़ पट्टी के कोट तल्ला गांव ने पर्यावरण संरक्षण की अभिनव पहल की है। शादी व अन्य आयोजनों में डिस्पोजल के उपयोग को प्रतिबंधित कर अब, गांव में मालू के पत्ते से बने दोने व पत्तल का उपयोग किया जाएगा। यहां 20 महिलाओं व स्कूली बच्चों को दोने व पत्तल बनाना सिखाया जा रहा है । ग्रामीणों को मालू के औषधीय गुणों के साथ रोजगार की संभावनाओं के बारे में जानकारी दी जा रही है।
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अगस्त्यमुनि ब्लाक यह दूरस्थ गांव लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्य करता आ रहा है। बीते बरसात में प्राथमिक स्कूल के बच्चों के साथ 500 बांज के पेड़ों का रोपण कर ग्रामीणों को देखरेख की जिम्मेदारी सौंपना हो, या फिर श्रमदान से नियमित रास्तों की सफाई। अब, ग्रामीणों ने शादी व अन्य आयोजनों में मालू के पत्ते से दोने व पत्तल बनाकर उनका उपयोग किया जाएगा। शिक्षक सत्येंद्र सिंह भंडारी व दिनेश चौधरी राजकीय प्राथमिक विद्यालय में बीते दस दिनों से गांव की महिलाएं और कक्षा 4 व 5 के छात्र-छात्राएं मालू के पत्ते से दोना व पत्तल बनाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रभारी प्रधानाध्यापक भंडारी व विद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष दिनेश चौधरी बताते हैं कि स्थानीय जंगलों में 25 फीसदी मालू के पेड़ हैं। यह पत्ता औषधीय गुणों के साथ मवेशियों के लिए चारा भी होता है। प्रशिक्षण ले रही माला देवी, संपदा देवी, सुनीता देवी, ऊषा देवी, मंजू देवी, सुनीता देवी का कहना है कि वे मालू पत्ता को स्वरोजगार से जोड़कर आमदानी का जरिया बनाएंगे।
तय दिन पर लाया जाता था मालू पत्ता
मालू के पत्ते का पहाड़ के जीवन से सदियों पुराना संबंध है। नामकरण, मुंडन, शादी व देव नृत्य सहित मासिक व वार्षिक श्राद्ध में मालू के पत्ते से बने दोने व पत्तल का उपयोग होता आ रहा है। जंगल से इस पत्ते को लाने के लिए पंचांग गणना के आधार पर तिथि तय होती थी।
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मालू का पत्ता हमारी पारंपरिक विद्या से जुड़ा है, इसे पुन: अपने जीवन में शामिल कर संरक्षण के लिए हमें मिलकर कार्य करना होगा। यह पत्ता और इसका पेड़ पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाता है।
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-- जगत सिंह जंगली, पर्यावरणविद्, निवासी कोट तल्ला
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