रुद्रप्रयाग। परंपराओं के निर्वहन को पांडव पश्वाओं के रूप में अवतरित होकर आज भी केदारघाटी व जिले के गांवों में पधारकर भक्तों को आशीर्वाद दे रहे हैं। इस धार्मिक अनुष्ठान के आयोजन से प्रवासियों सहित ध्याणियां भी शामिल हो रही हैं।
केदार घाटी सहित जिले के अन्य गांवों में पांडवों की विरासत को आज भी ग्रामीण पांडव लीला के रूप में संजोए हुए हैं। छोटी दीपावली (इगास) से गांवों में अनुष्ठान शुरू हो गया है, जो इस माह के आखिरी तक होंगे। बीते वर्ष जहां अगस्त्यमुनि ब्लाक के बीरों गांव में 45 वर्ष बाद पांडव नृत्य हुआ वहीं ऊखीमठ के कांडा में 30 वर्ष यह अनुष्ठान हुआ। यहां के पाली व भरदार के दरमोला गांव में नवंबर में पांडव नृत्य संपन्न हो चुके हैं। इधर, तल्लानागपुर के चापड़, धारकोट, कोठगी और कोंन्था गांव में पांडव नृत्य हो रहा है। 11 से 45 दिन तक चलने वाले आयोजन में चक्रव्यूह, मकरव्यूह, कमलव्यूह, मोरोद्वार, गैंडा कौथिग, पैंया डाली, गंगा स्नान, दुर्योधन वध आदि लीलाओं का ढोल-दमाऊं की थाप पर पारंपरिक गायन व नृत्य से पश्वा मंचन कर रहे हैं।
गुप्तकाशी के देवर गांव में भी पांडव नृत्य से रौनक बनी हुई है। इधर, जखोली ब्लाक के जवाड़ी गांव में तीन वर्ष बाद बुधवार से पांडव नृत्य शुरू हो रहा है। जिला मुख्यालय के पुनाड़ में एक सप्ताह से आयोजन चल रहा है। विशंभर प्रसाद नौटियाल, महेश ड्यूंडी, सतवीर सिंह आदि ने मान्यताओं का हवाला देते हुए बताया कि महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव स्वर्गारोहिणी के लिए जा रहे थे, तो उन्होंने क्षेत्र व केदारघाटी के लोगों को अपने शस्त्र-शस्त्र संभालने के लिए दिए थे। तब, ग्रामीणों ने उनसे आग्रह किया था, कि वे उन्हें फिर कब दर्शन देंगे। पांडवों ने कहा कि वे जब भी उन्हें आह्वान करेंगे, वे गांवों में आएंगे। इसी परंपरा के तहत समय-समय पर ग्रामीणों द्वारा पांडव लीला का आयोजन किया जा रहा है।